अक्षय तृतीया 2020 – अक्षय तृतीया पर्व तिथि व मुहूर्त-ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव

अक्षय तृतीया 2020 – अक्षय तृतीया पर्व तिथि व मुहूर्त-
ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव
भारतीय पर्वों में अक्षय तृतीया पर्व का विशेष महत्व है। इस मुहूर्त को बेहद शुभ माना जाता है। किसी भी नए काम की शुरुआत से लेकर महत्वपूर्ण चीजों की खरीदारी व शादी विवाह जैसे काम भी इस दिन बिना किसी शंका के किए जाते हैं.Akshay Tritiya 2020

भारत में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के अनुसार सांस्कृतिक विभिन्नताएं मिलती हैं। हर धर्म, हर क्षेत्र में कुछ खास त्यौहार प्रचलित होते हैं। इन्हीं त्यौहारों के जरिये उस धर्म या उस क्षेत्र की संस्कृति को समझ सकते हैं। दिवाली, ईद, क्रिसमस आदि त्यौहार उदाहरण के रूप में लिये जा सकते हैं। लेकिन इन बड़े त्यौहारों के अलावा भी कुछ विशेष दिन होते हैं जिन्हें अपनी-अपनी धार्मिक सांस्कृतिक मान्यताओं द्वारा सौभाग्यशाली माना जाता है। हिंदूओं में लगभग वर्ष के हर मास में कोई न कोई व्रत व त्यौहार अवश्य मिलता है। चाहे वह दिन यानि वार विशेष का उपवास हो या फिर तिथि विशेष का। हर व्रत त्यौहार के पिछे मानव कल्याण के संदेश देती पौराणिक कथाएं भी होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि एक ऐसी ही तिथि है जिसे बहुत ही सौभाग्यशाली माना जाता है।

अक्षय तृतीया से जुड़ी मान्यताएं

अक्षय तृतीया का पावन पर्व वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है. अक्षय का मतलब है जिसका कभी क्षय ना हो यानी जो कभी नष्ट ना हो, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं उनका अनेकों गुना फल मिलता है. भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया तिथि का विशेष महत्व है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है. इस दिन बिना पंचांग देखे भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश किया जा सकता है. इसे अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, अबूझ मुहूर्त यानी इस दिन कोई भी काम ग्रह स्थिति और शुभ मुहूर्त देखकर नहीं किया जाता। पूरा दिन ही शुभ मुहूर्त माना गया है। ऐसा क्यों है कि इस तिथि को अक्षय यानी जिसका कभी क्षरण ना हो, जो हमेशा कायम रहे, कहा जाता है। इसके पीछे कई पौराणिक मान्यताएं हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने परशुराम के रुप में अवतर अक्षय तृतीया के दिन ही लिया था. इसलिए परशुराम का जन्मउत्सव भी इसी दिन मनाया जाता है.

 भगवान परशुराम के जन्म के अलावा भी कुछ और पौराणिक घटनाएं हैं, जिनका अक्षय तृतीया पर घटित होना माना जाता है

जैसे गंगा और भगीरथ – गंगा ने स्वर्ग से धरती के लिए जो यात्रा शुरू की, वो तिथि अक्षय तृतीया ही थी।

कृष्ण और सुदामा का मिलन- जब गरीबी से परेशान सुदामा पत्नी के कहने पर कृष्ण से मिलने पहुंचे, वो तिथि थी अक्षय तृतीया।

द्रोपदी का चीरहरण- जब महाभारत में द्रोपदी का चीरहरण हुआ था तो भगवान कृष्ण ने उन्हें वो वस्त्र प्रदान किया था जो कभी खत्म ना हो। 

महाभारत की रचना-महाभारत की रचना शुरू होने की तिथि भी अक्षय तृतीया मानी गई है। 

अक्षय तृतीया पर्व तिथि व मुहूर्त 2020

अक्षय तृतीया – 26 अप्रैल 2020

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त – 05:48 से 12:19

 सोना खरीदने का शुभ समय –  05:48 से 13:22

 तृतीया तिथि प्रारंभ – 11:51 (25 अप्रैल 2020)

 तृतीया तिथि समाप्ति – 13:22 (26 अप्रैल 2020)

 अक्षय तृतीया को श्रेष्ठ तिथियों में से एक माना जाता है। ज्योतिष ग्रंथ और पौराणिक मान्यताएं कहती हैं कि इस दिन जो भी शुभ कार्य शुरू होता है, उसका सबसे अच्छा फल इस तिथि को मिलता है। इसलिए, आज भी ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा विवाह इसी तिथि पर आयोजित होते हैं, इसके पीछे इसका पौराणिक महत्व तो है ही, साथ ही ग्रामीण भारत में अक्षय तृतीया के बाद नई फसलों की बोवनी शुरू होती है, इस समय गांवों में लोग ज्यादा व्यस्त नहीं होते।

 

अक्षय तृतीया के दिन कैसे प्राप्त करे सबसे बड़ा धन

 

लोग अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदते हैं ऐसी परंपरा सदियों से चली आ रही है लेकिन क्या अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदना या कोई और चीज खरीदना जरूरी है. जी नहीं, अक्षय तृतीया के दिन खरीदारी करने से कहीं ज्यादा महत्व दान करने का है. अक्षय तृतीया के दिन यदि आप दान करेंगे तो निश्चित रूप से आपके जीवन में पॉजीटिविटी बढ़ेगी, परेशानियों से लड़ने की ताकत मिलेगी और सुख-समृद्धि बढ़ेगी.

अपने घर में सुख-समृद्धि को बढ़ाने के लिए अक्षय तृतीय के दिन गरीबों को आटा, चावल, दाल, फल, सब्जियां दान करें. गर्मी से राहत के लिए गरीबों को जल पात्र, घड़ा, पानी वाले जग दान करें. यदि हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहे तो हम हर प्रकार का धन अर्जित कर सकते हैं इसलिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए अक्षय तृतीया के दिन गरीब बीमार लोगों को दवाईयों का दान करें. दवाईयों का दान करने से आपको विशेष पुण्य मिलेगा, गरीबों को मदद मिल जाएगी और उनके आशीर्वाद से आपको निरोगीकाया प्राप्त होगी.

इसलिए इस बार अक्षय तृतीया के दिन आगे बढ़कर दान करें अपने बच्चों के हाथों से दान कराएं आपको सुकून मिलेगा परिवार में खुशियां बढ़ेंगी और यही सबसे बड़ा सर्वश्रेष्ठ धन है

जानिए कैसे करें अक्षय तृतीया व्रत...

कैसे करें व्रत 


* व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।

* घर की सफाई व नित्य कर्म से निवृत्त होकर पवित्र या शुद्ध जल से स्नान करें।

* घर में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।


 

निम्न मंत्र से संकल्प करें :-


ममाखिलपापक्षयपूर्वक सकल शुभ फल प्राप्तये

भगवत्प्रीतिकामनया देवत्रयपूजनमहं करिष्ये। 

 संकल्प करके भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं।


* षोडशोपचार विधि से भगवान विष्णु का पूजन करें।


* भगवान विष्णु को सुगंधित पुष्पमाला पहनाएं।




* नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पण करें।


* अगर हो सके तो विष्णु सहस्रनाम का जप करें।


* अंत में तुलसी जल चढ़ा कर भक्तिपूर्वक आरती करनी चाहिए।


* इस दिन उपवास रखें। 

जानिए अक्षय तृतीया की व्रत-कथा

कथा− अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, ‘राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−

 

प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्म्णों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत के काल में जब पांडव वनवास में थे। एक दिन श्रीकृष्ण जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है, ने उन्हें एक अक्षय पात्र उपहार स्वरुप दिया था। यह ऐसा पात्र था जो कभी भी खाली नहीं होता था और जिसके सहारे पांडवों को कभी भी भोजन की चिंता नहीं हुई और मांग करने पर इस पात्र से असीमित भोजन प्रकट होता था। श्रीकृष्ण से सम्बंधित एक और कथा अक्षय तृतीया के संदर्भ में प्रचलित है। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण के बालपन के मित्र सुदामा इसी दिन श्रीकृष्ण के द्वार उनसे अपने परिवार के लिए आर्थिक सहायता मांगने गए थे। भेंट के रूप में सुदामा के पास केवल एक मुट्ठीभर पोहा ही था। श्रीकृष्ण से मिलने के बाद अपना भेंट उन्हें देने में सुदामा को संकोच हो रहा था। परंतु भगवान कृष्ण ने मुट्ठीभर पोहा सुदामा के हाथ से लिया और बड़े ही चाव से खाया। चूंकि सुदाम श्रीकृष्ण के अतिथि थे इसलिए श्रीकृष्ण ने उनका भव्य रूप से आदर-सत्कार किया। ऐसे सत्कार से सुदामा बहुत ही प्रसन्न हुए किन्तु आर्थिक सहायता के लिए श्रीकृष्ण ने कुछ भी कहना उन्होंने उचित नहीं समझा और वह बिना कुछ बोले अपने घर के लिए निकल पड़े। जब सुदामा अपने घर पहुंचें तो दंग रह गए। उनके टूटे-फूटे झोपड़े के स्थान पर एक भव्य महल था और उनकी गरीब पत्नी और बच्चें नए वस्त्र, आभूषण से सुसज्जित थे। सुदामा को यह समझते देर न हुई कि यह उनके मित्र और विष्णु अवतार श्रीकृष्ण का ही आशीर्वाद है। यही कारण है कि अक्षय तृतीया को धन-संपत्ति की लाभ प्राप्ति से भी जोड़ा गया है।

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