भूल गये है तो इस प्रकार कुलदेव और कुलदेवी को पहचाने.

कूलदेवी-कुलदेवता की पूजा के लाभ.

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हिन्दू धर्म में वैदिक संस्कारो का प्रारम्भ लक्ष्मी नारायण के आह्वान से होता है और कुल देवी या कुल देवता को नमन से होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुलदेवी या देवता व्यक्ति की वंशावली की सुरक्षा करते हैं और उस व्यक्ति विशेष या परिवार का सुरक्षा चक्र स्थापित करते हैं।

पूर्व के हमारे ऋषी कुलों अर्थात पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने अराध्य देवी देवता को कुल देवता अथवा कुलदेवी का कह कर उन्हें पूजना शुरू किया था । ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति कुलों की रक्षा करती रहे ।  जिससे उनकी नकारात्मक शक्तियाँ, उर्जाओं और वायव्य बाधाओं से रक्षा होती रहे तथा वे निर्विघ्न अपने कर्म पथ पर अग्रसर रह उन्नति करते रहे । आज हमारी भारतीय सभ्यता ने पाश्चात्य सभ्यता को इस हद तक अपना लिया है कि लोग अपने कुलदेव और कुलदेवी को ही भूलने लगे है |जब हमें अपने कुलदेव और कुलदेवी(Kuldev Kuldevi) के विषय में जानकारी ही नहीं होगी तो संभव है कि उन्हें समय-समय पर पूजा और भोग आदि भी अर्पित नहीं होगा जिससे हमारे परिवार पर उनकी कृपा हटने लगेगी |

समय क्रम चलता गया, परिवार बढता रहा और जीवन उपार्जन के लिये परिवार के सदस्य दुसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने लगे।कोई धर्म परिवर्तन करने, कोई आक्रान्ताओं के भय से विस्थापित होने लगे, जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने से संस्कारों का क्षय होने लगा, परिवार मे अन्तरजातिय विवाह से संस्कार भूलते जाने से, परिवार केे पीछे के कारण को न समझ पाने आदि इत्यादि कारण से बहुत से परिवार अपने कुल देवता ता कुलदेवी को भूल गए अथवा उन्हें मालूम ही नहीं रहा।

बहुत से परिवार अपने जीविकार्पाजन के लिये गाव छोडकर शहर मै जा बसे या देश छोडकर बिदेश । फिर वो धिरे धिरे परिवार से दूर होते गये और अपने पारिवारीक सदस्य भूलते गये । अपने अपने कामकाज मै लग गये।

ऐसे परिवार को पता ही नही की उनके कुल देवता या कुलदेवी कौन हैं ? किस प्रकार उनकी पूजा की जाती है ? इनमे पीढ़ियों से शहरों में रहने वाले परिवार अधिक हैं । कुछ स्वयंभू आधुनिक मानने वाले और हर बात में वैज्ञानिकता खोजने वालों ने भी अपने ज्ञान के गर्व में अथवा अपनी वर्त्तमान अच्छी स्थिति के गर्व में इन्हें छोड़ दिया या इन पर ध्यान नहीं दिया।

प्रत्येक हिन्दू वंश और कुलों में कुल देवता अथवा कुल देवी की पूजा की परंपरा रही है |इस परंपरा को हमारे पूर्वजों और ऋषियों ने शुरू किया था |उद्देश्य था एक ऐसे सुरक्षा कवच का निर्माण जो हमारी सुरक्षा भी करे और हमारी उन्नति में भी सहायक हो |यह हर कुल और वंश के लिए विशिष्ट प्रकार की उर्जाओं की आराधना है ,जिसमे हर वंश के साथ अलग विशिष्टता और परंपरा जुडी होती है |कुछ वंश में कुल देवी होती हैं तो कुछ में कुल देवता |आज के समय में अधिकतर हिन्दू परिवारों में लोग कुल देवी और कुल देवता को भूल चुके हैं जिसके कारण उनका सुरक्षा चक्र हट चूका है और उन तक विभिन्न बाधाएं बिना किसी रोक टोक के पहुच रही हैं |

परिणाम स्वरुप बहुत से परिवार परेशान हैं |इनमे स्थान परिवर्तन करने वाले अधिक हैं जैसे

जो लोग आजादी के बाद पाकिस्तान से आये उनको पता नहीं हैं ,

जो विदेशों में बस गए उनको पता नहीं है,

,जिन्होंने किसी कारण धर्म अथवा सम्प्रदाय बदल दिया उन्हें पता नहीं है ,

 बहुत से सिक्ख और जैन में यह समस्या पाई है जिनके पूर्वज हिन्दू हुआ करते थे और कुल देवता की पूजा होती रही थी उनके यहाँ पहले ,पर बाद में बंद हो गयी |

ऐसे कुछ परिवार आज विभिन्न बाधाओं से परेशान हैं ,पर आज की पीढ़ी को कुल देवता/देवी का पता ही नहीं है |वह अक्सर हमसे पूछते रहते हैं की आखिर वे अब करें तो क्या करें |

कौन है कुलदेवी या कुलदेवता

कुलदेवी या कुलदेवता दरअसल कुल या वंश की रक्षक देवी देवता होते है । ये घर परिवार या वंश परम्परा की प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते है । सर्वाधिक आत्मीयता के अधिकारी इन देवो की स्थिति घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी महत्वपूर्ण होती है।

यदि कुलदेवी या कुलदेवता रुष्ट हो जाए तो

 अत: कुलदेवी या कुलदेवता की उपासना या महत्त्व दिए बगैर सारी पूजा एवं अन्य कार्य व्यर्थ हो सकते है । इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है की यदि ये रुष्ट हो जाए तो अन्य कोई देवी देवता दुष्प्रभाव या हानि कम नही कर सकता या रोक नही लगा सकता । इसे यूं समझे – यदि घर का मुखिया पिताजी माताजी आपसे नाराज हो तो पड़ोस के या बाहर का कोइ भी आपके भले के लिया आपके घर में प्रवेश नही कर सकता क्यो कि वे “बाहरी ” होते है।

कूलदेवी-कुलदेवता की पूजा के लाभ

कुलदेवी की कृपा से पुरे परिवार में शान्ती एवं सम्पन्नता आती है । कुलदेवी – कुलदेवता पुरे परिवार की रक्षा करते है । आने वाले संकटों को हटा देते है । इसी लिये पूजाओं में, यज्ञ में कुलदेवी, कुलदेवता की पूजा का विधान है । कुलदेवी-कुलदेवता के साधन करने से पितृ दोष दूर हो जाते है।

 कूलदेवीकुलदेवता की कृपा

जिस प्रकार माँ-बाप स्वत: अपने पुत्र पुत्रियों के कल्याण के प्रति चिन्तित रहते है । ठीक उसी प्रकार कुलदेवी-कुलदेवता अपने कुल के प्रति कृपा करने को तत्पर रहते है । ठीक माँबाप, एक कुल के अविभावक की तरह अपने कुल की उन्नती, समृद्धि और साधन युक्त बनाने की हर तरह से सहायता करते है । वे अपने कुल को सहायता करने से अपने आप मै अपूर्व आनन्द होते है । परिवार के सुख, उन्नती, समृद्धि मै कुलदेवी-कुलदेवता की हाथ बहूत बडा होता है।

मूल रूपसे कुलदेवी-कुलदेवता अपनी कृपा कुल पर वरसाने को हमेशा तत्पर रहते है। पर देव योनी में होने के कारण विना मागे स्वत देना उनके लिये उचित नही होता । इस लिये हवन, यज्ञ, पूजा, आरती में कुलदेवी-कुलदेवता का पूजा का विधान है । कूलदेवी-कुलदेवता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कूल की सहायता हमेशा करते है । व्यक्ति की पहचान सर्वप्रथम कुल से होती है । प्रत्येक व्यक्ती का जीस प्रकार नाम होता है, गौत्र होता है । उसी प्रकार कुल भी होता है । कुल अर्थात खानदान या वंश परम्परा।

इतना तो आप समझ गए हैं कि कुल देवी-देवता की कृपा परिवार की चहुंमुखी उन्नति के लिए आवश्यक है, क्योंकि परिवार में कुल और वृक्ष में मूल (जड़) एक जैसे हैं। कुल किसी भी परिवार की मूलभूत इकाई है और एक कुल के लोगों का एक-दूसरे से रक्त-जनित सम्बन्ध है। बेशक वे समय के प्रवाह में एक-दूसरे से बहुत अलग हो गए हैं, पर वंशावलि तो एक ही है।

 

अपने कुलदेव और कुलदेवी को भूल गये है तो

कुलदेवता-कुलदेवी की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो उनको जीवन मै कोई ख़ास अंतर नहीं समझ में आया । फिर धिरे धिरे समय गुजरता गया और कालचक्र बढता गया, सुरक्षा चक्र हटता गया, तो परिवार में दुर्घटनाओं, नकारात्मक ऊर्जा, वायव्य बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो गया, उन्नति रुकने लगी, पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पायी, संस्कारों का क्षय, नैतिक पतन, कलह, उपद्रव, अशांति शुरू हो गयी तब ये समाधान करने की और भाग्ने लगे । पंडीत, तान्त्रिक, ज्योतिषी आदि इत्यादी को दिखाने से इनको पता चला की कुलदेवता या कुलदेवी की महिमा क्या होती है।

 यही किसी भी ईष्ट को दी जाने वाली पूजा को ईष्ट तक पहुचाते हैं । यदि इन्हें पूजा नहीं मिल रही होती है तो यह नाराज भी हो सकते हैं और निर्लिप्त भी हो सकते हैं । ऐसे में आप किसी भी ईष्ट की आराधना करे वह उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता। क्यो कि सेतु कार्य करना बंद कर देता है।

बाहरी बाधाये, अभिचार आदि, नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुचने लगती है । कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही ईष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है । अर्थात पूजा न ईष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है । ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम शशक्त होने से होता है । 

कुलदेवता या कुलदेवी सम्बंधित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति, उलटफेर, विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं । सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर करना बहूत जरूरी  है । यह परिवार के अनुसार भिन्न समय होता है और भिन्न विशिष्ट पद्धति होती है । शादी-विवाह-संतानोत्पत्ति आदि होने पर इन्हें विशिष्ट पूजाएँ भी दी जाती हैं।

यदि यह सब बंद हो जाए तो यह नाराज होते हैं या कोई मतलब न रख मूकदर्शक हो जाते हैं और परिवार बिना किसी सुरक्षा आवरण के पारलौकिक शक्तियों के लिए खुल जाता है । परिवार में विभिन्न तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं । 

अपने परिवार या गोत्र के बुजुर्गो से कुलदेवता या कुलदेवी के बारे में जानकारी लेवें । यदि मालूम न हो तो यह जानने की कोशिश करे की झडूला, मुण्डन सस्कार आपके गोत्र परम्परानुसार कहा होता है । जात कहा दी जाती है या विवाह के बाद एक अंतिम फेरा (५,६,७ वां ) कहा होता है । हर गोत्र, धर्म के अनुसार भिन्नता होती है।

 सामान्यत: ये कर्म कुलदेवी, कुलदेवता के सामने होते है । और यही इनकी पहचान है ।  कुलदेव परम्परा भी लुप्तप्राय हो गयी है । जिन घरो में प्राय: कलह रहती है, वंशावली आगे नही बढ रही है (निर्वंशी हो रहे हों , आर्थिक उन्नति नही हो रही है, विकृत संताने हो रही हो अथवा अकाल मौते हो रही हो, उन परिवारों में विशेष ध्यान देना चाहिए । कभी कभी इस तरह के उत्पात पितृ देव, पितर के कारण भी होते है ।

 

कुल देवता या देवी के प्रति आस्था

प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपने कुल देवता या देवी को जानना चाहिए तथा यथायोग्य उन्हें पूजा प्रदान करनी चाहिए । जिससे परिवार की सुरक्षा -उन्नति होती  रहे ।

यदि घर में खूशहाली, शुखशान्ती, समृद्धि, उन्नती बनानी है, रूके काम, अड्चन, रोगदोष, व्यधि हटानी है तो सब से पहले आप अपने कुलदेवी-कुलदेवता को मनाने की जरूरत है । उनको प्रशन्न करने के लिये  उचित पूजा, हवन यज्ञ करने की जरूरत है । ये सब काम उनको बिना प्रसन्न किये संभव नही है ।

हर व्यक्ति अपने दूखों का कारण खोजने का प्रयास करता है कारण जल्दी नहीं पता चलता क्यो कि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता है । अतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है ,भाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है ।

कुलदेवी या कुलदेवता साधना अनुष्ठान

यदि ध्यान दिया जाये तो विशेष पूजा या साधना करके कुलदेवी या कुलदेवता को प्रसन्न किया जा सकता है । उनको प्रसन्न करने के लिये एक विशेष साधना या पूजा का विधान है।

उनकी विशेष साधना से पहले गणपति पूजन, गुरू पुजन, भैरव स्मरण आदि अवश्यक रूप से सपन्न किया जाता है । इन के पूजा के वाद कुलदेवता के मन्त्र “कुलदेवता, कुलदेवी भ्यो नम:” का उच्चारण करके दैनिक 21 माला करनी चाहीये । ये साधना मुख्यतया दो सप्ताह की है । इस साधना हेतु कुलदेवता यंत्र,गुटिका या मूर्ति कुलदेवी भैषज आवश्यकता पडती है । यह बिशेष कुलदेवी-कुलदेवता मंत्र है । वस्तुत कुलदेवी-कुलदेवता ही साधक को समस्त प्रकार की वैभव, उन्नती, शक्ती, प्रतिष्ठा, सुखशान्ती प्रदान करने मे सक्षम है । और कोई भी देव देवता नही दे सकता ।

✅यह पूजा पद्धति हिन्दू ,जैन ,सिक्ख ,सिन्धी ,गुजराती ,मराठी सभी को दृष्टिगत रखते हुए बनाई गयी है और इसमें ऐसी प्रक्रिया अपनाई गयी है जिससे उनके तात्कालिक धर्म -सम्प्रदाय की मान्यता और पूजा आदि से कोई टकराव न हो |चूंकि यह सभी दुर्गा ,काली ,शिव को मानते हैं और सभी के कुलदेवता शिव परिवार से ही होते हैं अतः सभी इस पूजा को कर सकते हाँ |यदि पूजा करने में या समझने में कोई दिक्कत हो तो किसी योग्य विद्वान् की मदद लें |एक बार अच्छे से समझ कर पूजा करें और इसे हर साल जारी रखें |योग्य विद्वान् का मार्गदर्शन आपकी सफलता में वृद्धि करेगा |यह पूजा पद्धति हमारे द्वारा विभिन्न पद्धतियों का अध्ययन कर मध्य मार्ग के रूप में चुना गया है और सामान्यजन के लाभार्थ प्रस्तुत है |सबके लिए उपयुक्त हो आवश्यक नहीं ,जो पूजन पद्धति एक बार अपनाई जाए उसे फिर बदला न जाए |

 

इस लिये आप की उन्नती, सुखशान्ती, वैभव, समृद्धि, प्रतिष्ठा, मानसम्मान बढाने एवं रोगदोष, संकट, रूके काम सब दूर करने का अचूक उपाय आप के हाथ मे ही है । मै हमेशा आप को यही कहता हूं की आप अपने कुलदेवी-कुलदेवता को हमेशा खुश रखो । हर पल उनका ध्यान धरो । शुभ काम करने से पहले ऊनका आर्शीवाद ले । आप के कूलदेवी-कुलदेवता खूश है तो हर खुशी आप के कदमों में है।

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