जानिए गुरु पूर्णिमा 2020 का महत्व-ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) कहते हैं। इस दिन अपने गुरु की पूजा का विधान है। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की रचना की थी। इस कारण उनका वेद व्यास भी कहा जाता है। वह आदिगुरु कहलाते है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) को व्यास पूर्णिमा (Vyas Purnima) नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो दुनिया में कई विद्वान हुए हैं। परंतु चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता व्यास ऋषि थे, जिनकी आज के दिन पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं। अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए हमें अपनेअपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पूजा करके उन्हें कुछ कुछ दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए।

गुरु का जीवन में विशेष स्थान होता है। यदि योग्य गुरु का साथ मिल जाए तो उनके आशीर्वाद से जीवन के संघर्ष कम होते है। यश उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। गुरु अपने वचनों से हमारे मन की परेशानी कम करते हैं।

हमें यह याद रखना चाहिए कि महात्माओं का श्राप भी मोक्ष की प्राप्ति कराता है। यदि राजा परीक्षित को ऋषि का श्राप नहीं होता तो उनकी संसार के प्रति जो आसक्ति थी वह दूर नहीं होती। आसक्ति होने के कारण उन्हें वैराग्य नहीं होता और वैराग्य के बिना श्रीमद्भागवत के श्रवण का अधिकार प्राप्त नहीं होता। साधु के श्राप से ही उन्हें भगवान नारायण, शुकदेव के दर्शन और उनके द्वारा देव दुर्लभ श्रीमद्भागवत का श्रवण प्राप्त हुआ।

इसके मूल में ही साधु का श्राप था जब साधु का श्राप इतना मंगलकारी है तो साधु की कृपा जाने क्या फल देने वाली होती होगी। अत: हमें गुरूपूर्णिमा के दिन अपने गुरु का स्मरण अवश्य करना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) से चार महीने तक ऋषिमुनि एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं, इस समय मौसम भी अनुकूल होता है अत: उनके अनुयायी उनके शिष्य, भक्त जन अपने गुरु के चरणों में उपस्थित रहकर ज्ञान, भक्ति, शान्ति, योग एवं अपने कर्तव्यों के पालन आदि की शिक्षा प्राप्त करते है, उनके सत्संग का लाभ उठाते है

हिन्दु धर्म शास्त्रों में गुरू को अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार गुरु की कृपा से ही धर्म, ज्ञान, सांसारिक कर्तव्यों का पालन एवं ईश्वर की भक्ति संभव है

 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय

 

इस श्लोक में गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्व दिया गया है क्योंकि वह ही हमें अज्ञान रूप अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर लेकर जाता है और उसी के दिखाए हुए मार्ग पर चलकर ही ईश्वर की प्राप्ति होती है

 

         

गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है

गुरु अपने शिष्य की ना केवल समस्त जिज्ञासाएं ही शान्त करता है वरन वह उसको जीवन के सभी संकटो से बाहर निकलने का मार्ग भी बतलाता है गुरु ही शिष्य को सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है , अपने शिष्य को नयी ऊँचाइयों पर ले जाता है।शास्त्रों के अनुसार जीवन में ज्ञान, प्रभु भक्ति, सुखशान्ति और देव ऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए, अपने समस्त कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए सच्चे गुरु की नितान्त आवश्यकता होती है। वास्तव में जिस भी व्यक्ति से हम से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु होता है और हमें उसका अवश्य ही सम्मान करना चाहिए।

 

गुरु पूर्णिमा के वर्षा ऋतु ही क्यों श्रेष्ठ?

गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु में ही क्यों मनाई जाती है। अगर नहीं तो आज हम आपको बताएँगे कि आखिर ऐसा क्यों हैं। दरअसल वर्षा ऋतू में पूर्णिमा अधिक गर्मी और अधिक सर्दी होती है| यह समय अध्ययन और अध्यापन के लिए अनुकूल सर्वश्रेष्ठ है|ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है इसलिए गुरुचरण में उपस्थित शिष्य ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति को प्राप्त करने हेतु इस समय का चयन करते हैं|

गुरु पूर्णिमा 2020 - गुरु पूर्णिमा कब है तिथि व शुभ मुहूर्त/When is Guru purnima 2020, shubh Muhurtha and Tithi

गुरु पूर्णिमा 2020: जानें तिथि और घर पर पूजा करने की विधि-मंत्र

व्यास पूजा विधि

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सबसे पहले अपने गुरु स्थान पर जाये या जिन्होंने गुरु नही बना रखा वो निराश न हो उन के लिये भी गुरु पूजा की विधि हैं

यदि आपके गुरु इस दुनिया में सशरीर नहीं हैं या आपने किसी को अपना आध्यात्मिक गुरु नहीं बनाया है, ऐसे में आप व्यासजी की पूजा कर सकते हैं। इसके लिए स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थान या मंदिर में एक चौकी पर सफेद या केसरिया रंग का कपड़ा बिछाकर आटे से चोक बना लें। इसमें व्यासजी की मूर्ति रखें। यदि मूर्ति हो तो आप वेदपुराण या अन्य धार्मिक पुस्तकें रखकर उनकी पूजा भी कर सकते हैं। इसके बाद योग्य पंडितजी दानदक्षिणा दें।

  1. इस दिन प्रातःकाल स्नान पूजा आदि नित्यकर्मों को करके उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए।

  2. फिर व्यास जी के चित्र को सुगन्धित फूल या माला चढ़ाकर अपने गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊँचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए।

  3. इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर कुछ दक्षिणा यथासामर्थ्य धन के रूप में भेंट करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

सबसे पहले अपने गुरु स्थान पर जाये या जिन्होंने गुरु नही बना रखा वो निराश न हो उन के लिये भी गुरु पूजा की विधि हैं

सबसे पहले अपने घर में साफ सफाई करे और एक स्थान पर जगत गुरु वेद व्यास जी की प्रतिमा लगाये या एक सफ़ेद कपड़ा लेकर उस पर पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण गंध से बारह-बारह रेखाएं बनाकर व्यासपीठ बनाएं।

उस के बाद इस मंत्र का उचारण करे तत्पश्चात गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये मंत्र से संकल्प करें।

इस के बाद दशों दिशा में जल छिडके

अब ब्रह्माजी, व्यासजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा, आवाहन आदि करें।

सबसे पहले आप गुरु मंत्र का उचारण करे

गुर्रुब्रह्मï गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:

गुरु: साक्षात् परमब्रह्मï तस्मै श्री गुरवे नम:।।

इस के बाद आप गुरु की प्रतिमा पर फुल चढ़ाये

इस के बाद आप एक दीपक जलाये देशी घी का

अब आप गुरु के नाम की जोत जलाये और भोग लगाये

और गुरु की आराधना करे और आरती करे और पुरे दिन गुरु के नाम का व्रत रखे

इस के बाद आप गुरु के सामने हाथ जोड़ कर विनती करे की हें गुरु देव आप हमारी जिन्दगी से अंधकार को दूर करे और हमारे जीवन को साकार करे.

 

akhanda-mandalākāram mantra

Akhaṇḍa-maṇḍalākāram vyāptam yena carācaram

(Which) pervades the entire unbroken form of the circle (of creation), moving and unmoving.

Tat padam darśitam yena, tasmai śrī gurave namah

 To that beautiful and benevolent Guru through whom that state was revealed (to me), salutations.

 Akhanda-mandalakaram

Akhanda

Undivided, indivisible, that which is not constituted of parts ever remains one, whole and complete.  By the invocation of which, by the presence of which within us all divisiveness and delusion of our minds and spiritual forces recover and discover our own interior indivisibility and rediscover that we are made of objects for a part of which we identify ourselves are not the parts of the one, undivided, indivisible, spiritual essence.

Mandala

That which adorns all forms and essences.  The warp and the web of the lines, rays, and strands of shakti emanating from a sun-like, moon-like point of energies along the lines of which the universes, forms and beings are constituted and like all the centripetal and centrifugal forces returns to the same.  Adorned and beautified with these designs yet not becoming parts, divisables.  The one complete whole.

Akaram

The one whom we call akaram adhya.  The one who we invite, the one whose akararama, presence we invoke and merge with our presence, with our essence.  Whose shape and form and configuration are no other than the indivisible arrangement of all the shaktis.

vyaptam yena characharam

Vyaptam

By whom, by the one whose location is in the bija mantra Yam in the heart center.  It is the place where the ascending and descending forces join in upward and downward triangles.  That which is the nada, the sound, an inaudible sound vibration of that union of the ascending and descending forces.  Yena by which, sound (vyaptam) is pervaded, is permeated.  Vy-aptam is filled in all its varieties.  Is made noble and sage-like through all of its vidyas, sciences, levels of knowledge.

Yena

Yena by whom it is permeated, pervaded, filled with nobility, knowledge and wisdom and all various ways (vyaptam).

 

Characharam

All that is moving, all that is unmoving, all that is moving that is the world of energies which alone have the true movement, which have the vibration, which do not merely give an appearance of moving but they that move all other things that are acharachara, not moveable by themselves, have not the power, the strength, the knowledge, the wisdom, the consciousness, the awareness, to move by themselves.  Whose movement is dependent only upon the moving forces, achara.  Unmoving like our body, like our bones, like blood, like our brain which are achara not moveable which cannot move without the chara forces.  The forces of divinity that wander and travel and course through all of these forms and make them move. Thus the chara and achara  both parts of my being, your being, our being,  universal being, our deeper essence are all vyaptam pervaded, permeated by that maha nada-that sound that dwells in the heart, where the ascending and the descending forces meet.  That one whose shape, form, configuration, is the adornment that is indivisible, the harmonious, centripetal and centrifugal lines and strands of energy and power.

 

tat padam darshitam yena Tat padam

That pedestal, that station, that state of consciousness, that level of awareness which is expressed by the word tat.  That as in tat savitur varenyum as in tat twam asi.  He who has show me the meaning of that level, that state of awareness which is the true meaning of the word tat-That.  He who has shown me the meaning of the word That.  Tat padam darshitam yena..

 

Darshitam

Was shown to me.

 

Yena

It is by Him.  By that one by that force, by that interior sound which is the concentration of the vibration of all the mantras.

 

Tasmai shri guruave namah.

Tasmai

To that one.

 

Shri Gurave namah

To that Shri Guru, the one.  Gu, darkness, ru, remover.  He who removes darkness by the presence of the force called Shri, which is the principle and divinity of all beauty.  By whose brilliant beauty gives refuge, ashraya, to all beings, all levels of essence.  To that remover of darkness who removes the darkness by that brilliance of beauty.  Divine Mother’s beauty.  Unto that one namaha.  Into that one I merge all my exterior beings and say of them not mine, not mine, not mine.  Not mine the body, not mine the limbs, not mine the organs, not mine the senses, not mine emotions, feelings, sentiments.  Not mine, intellect, intuition, doubt, resolution,  not mine.  Intent, declaration, statements that I am, not mine.  Unto that one I surrender all my claims of ego.  Namaha.  The last ma, ha sound.  The release of energy.  May I through that surrender find in myself that release. Release of that energy which I have kept blocked and because of which I have felt blocked in my life.  In my endeavors, in my undertakings.  I was blocked because I had not surrendered my mind.  Having surrendered my mind I say namaha.  This is the nature, this is the meaning of my surrender, my homage, my prostrations.  I take all of these claims and I burn them.  All my ego and I burn it into the fire of that essence which is the indivisible, universe adorning arrangement of the beautiful energies in all their various forms.  Imbuing and suffusing all immoveable things with the semblance of movement.  By whose presence by the presence of which force, by the grace of which force the meaning of the true pedestal has come to me, has become known to me.  I surrender.  I burn my being as an offering unto that fire.

 

Akhanda mandalakaram  vyaptam yena characharam  tat padam darshitam yena.

Tat padam darshitam yena tasmai shri guruva namah

 

अपना भाग्य प्रबल करने के लिए, जीवन में सफलता पाने के लिए गुरु पूर्णिमा के दिन करे ये आसान उपाय

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima)के दिन बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रांत: सूर्योदय से पूर्व जल में हल्दी, शहद, सफेद सरसों, नागरमोथा नामक वनस्पति व थोड़े से पीले फूल पानी में डालकर नहाना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन अपने गुरु के पास जाये उनको पुष्प भेंट करें उनका माल्यापर्ण करें, उन्हें अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य से फल, मिष्ठान, वस्त्र , और उपहार आदि अर्पित करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए उनका आशीर्वाद, उनकी कृपादृष्टि अवश्य ही प्राप्त करें ।

 गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन अपने माता -पिता, बड़े भाई-बहन आदि को भी उपहार देकर उनका आशीर्वाद भी अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए ।

 गुरु पूर्णिमा के दिन (Guru Purnima ke Din) अगर आपका कोई गुरु नहीं है तो अपने इष्ट देव को अपना गुरु मान के उनका पूजन कारण और प्रसाद चढ़ाएं।

 भगवान विष्णु इस जगत के पालनहार, समस्त ब्रह्मांड के गुरु हैं। इस दिन भगवान विष्णुजी का पूजन अवश्य ही करें और उनसे जीवन में कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करें। गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन भगवान विष्णु के चित्र के सामने या किसी भी मंदिर में गाय के घी का दीपक अवश्य ही जलाएं ।

 गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन गुरु यंत्र बनवाकर उसे शुभ मुहूर्त में अपने घर पर स्थापित करें । नित्य गुरु यंत्र को प्रणाम करने, बृहस्पति देव के मन्त्र का जाप करने से जीवन में शुभता आती है भाग्य प्रबल होता है ।

बृहस्पति एकाक्षरी बीज मंत्र- ऊं बृं बृहस्पतये नम:। का अधिक से अधिक जाप करें, इससे धर्म और ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

इसके अलावा इस दिन 

गायत्री मंत्र  “ ॐ भूर्भुव स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् “॥ का जाप करने से भी शुभ फल मिलता है, भाग्य मजबूत होता है ।

 इस दिन गाय की सेवा भी करनी चाहिए, गाय को गुड़ चना, हरा चारा खिलाने से परिवारिक सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है , कार्यों में आ रही अड़चने दूर होती है ।

 अपने व्यापार / कारोबार में तेजी लाने के लिए समस्त संकटो को दूर करने के लिए इस दिन किसी गरीब असहाय को पीले अनाज, पीले वस्त्र, पीली मिठाई दक्षिणा के साथ दान करना चाहिए।

इस दिन केले के एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें।

इस दिन चाँदी का टुकड़ा अपने घर की भूमि में दबाएं ।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) से शुरू कर हर गुरुवार को चमेली के 9 फूल बहते हुए जल में प्रवाहित करना चाहिए।

* गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।

* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।

* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।

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