वृद्धावस्था में संतान से सुख एक ज्योतिषीय दृष्टिकोण Jyotirvidh Shyama Gurudev

जिन्हें संतान का सुख है, वो भाग्यशाली, जिन्हें संतान से सुख वाे सौभाग्शाली

 ज्योतिष शास्त्र में मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को विस्तार से विचार-विमर्श किया जाता है इसी परिप्रेक्ष में मानव जीवन का चतुर्थ चरण अर्थात वृद्ध अवस्था अपने आप में अत्यंत दयनीय हो जाती है क्योंकि वर्तमान रहन-सहन का स्तर एवं समय के साथ बदलते रिश्ते कहीं ना कहीं व्रद्धावस्था के लिए बहुत अच्छा संकेत नहीं देते
कुंडली में यदि देखा जाए तो इसके लिए दशम भाव भाग्य स्थान पंचम भाव एवं लग्न भाव पर विचार करना आवश्यक होता है यदि कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत है और पंचमेश अच्छी स्थिति में स्थित है तो जातक को वृद्धावस्था में अपनी संतान से सुख प्राप्त होता है यदि भाग्येश पंचम स्थान में बैठा हो और पंचमेश दशम स्थान में बैठा हो तो ऐसे योग से व्रद्धावस्था अत्यंत सराहनीय मानी जाती है क्योंकि यह स्थिति जातक को धन एवं पारिवारिक सुख से संपन्न बनाती है यदि शनि ग्रह लग्न का मालिक होकर पंचम स्थान में बैठा हो तो ऐसे जातक प्रारंभिक अवस्था में संघर्ष में जीवन जीते हुए व्रद्धावस्था में लोगों के जीवन का सहारा बन जाते हैं यही कारण है कि ऋषि महर्षियों एवं राजनीतिज्ञों के लिए यह योग विशेषकर लाभदायक होता है |
पंचमेश यदि 6 8 12 भाव में बैठकर क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो खुद की संतान ही वृद्धावस्था में सहारा नहीं देती
यदि कुंडली में भाग्य स्थान पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो भी जातक को वृद्धावस्था में सुख नहीं प्राप्त होता है
यदि जातक की कुंडली में गुरु ग्रह एवं सूर्य ग्रह पीड़ित है तो संतान विलंब से होती है तथा जातक को वृद्धावस्था तक संतान से दारुण दुख प्राप्त होता है अतः वृद्धा वस्था को सुख में एवं अच्छा बनाने के लिए कुंडली के पंचम भाव को मजबूत होना आवश्यक है क्योंकि वृद्धा वस्था में सबसे बड़ा सहयोग अपनी संतान से ही प्राप्त हो सकता है
कुंडली के चतुर्थ भाव में शुक्र, बुध, बृहस्पति और चंद्रमा सुख देते हैं। इस भाव में शनि हो तो वृद्धावस्था में दुख होगा। राहु और केतु हो तो पुत्र सुख में कमी रहती है।
इसके लिए सप्तम भाव एवं सप्तमेश भी कहीं ना कहीं जिम्मेदार माने गए हैं क्योंकि जीवन में मरते दम तक साथ देने का संकल्प लेकर चलने वाले अपनी पत्नी यदि स्वस्थ एवं सशक्त है तो भी या जातक का अंतिम जीवन सुख में रहता है |

राशि बताएगी बेटा या बेटी में से कौन निभाएगा बुढ़ापे में आपका साथ

मेष:

 इस राशि के जातकों को बुढ़ापे में अपनी सबसे छोटी संतान से सुख की प्राप्ति होगी. ये संतान बेटी हो या बेटा लेकिन जो उम्र में सबसे छोटा होगा वही आपके बुढ़ापे का सहारा बनेगा.

वृषभ: 

ये राशि के जातक अपनी वृद्धावस्था में छोटे बेटे के द्वारा सुख प्राप्त कर सकेंगे. बड़ा बेटा भी इनके साथ रहेगा लेकिन ज्यादा देखरेख और प्यार छोटे बेटे का ही रहेगा.

मिथुन: 

इन्हें बुढ़ापे में अपनी बेटी का सबसे ज्यादा प्यार मिलेगा. यदि आपके बेटे आपको धोखा दे भी दे या आपका ठीक से ख्याल ना रखे तो आपकी लाडली बेटी आपकी जरूरतों को पूर्ण कर देगी.

कर्क: 

ये राशि वाले जातक थोड़े भाग्यशाली होती हैं. इन्हें बुढ़ापे में बेटे और बेटी दोनों का ही प्रेम नसीब होता हैं. इनका वृद्धावस्था बड़े ही आराम और सुकून के साथ बितता हैं.

सिंह: 

इनके लिए बुढ़ापे में देखरेख का काम बेटा करता हैं जबकि जब दिल से प्यार और इमोशनल सपोर्ट देने की बारी आती है तो बेटी काम आती हैं.

कन्या:

 इस राशि के जातकों को बेटी की सेवा का सुख मिलता हैं. इनकी बेटी बुढ़ापे में इनका ख़ास ख्याल रखती हैं. इनका अंतिम समय तक बेटी से ख़ास लगाव रहता हैं.

मकर: 

इन्हें जीवन में अपने बड़े बेटे के साथ ज्यादा समय बिताने का मौका मिलता हैं. इनका छोटा बेटा अन्य कामो में व्यस्त रहता हैं और ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता हैं.

धनु: 

इस राशि के जातकों को अपनी दूसरी संतान से सुख की प्राप्ति होती हैं. बेटा हो या बेटी लेकिन जो दूसरी संतान होती हैं वही इनका सबसे अधिक ध्यान रखती हैं.

वृश्चिक:

 इस राशि के जातकों को अपने दोनों बेटे (यदि हैं तो) का बुढ़ापे में लाभ मिलता हैं. ये दोनों ही सामान रूप से इनकी देखरेख करने में हेल्प करते हैं.

तुला: 

इन राशि के लोगो को सबसे छोटी बेटी का सहारा मिलता हैं. यदि बेटी ना हो तो बेटा ये काम करता हैं. इनकी बड़ी संतान बुढ़ापे में कोई ख़ास मदद नहीं करती हैं.

कुंभ: 

ये लोग बारी बारी से अपनी सभी संतों से सुख की प्राप्ति करते रहते हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि बुढ़ापे में इन्हें अपनी सभी संतानों से समय समय पर थोड़ा थोड़ा प्यार मिलता रहेगा.

मीन: 

इन्हें अपनी बड़ी बेटी या बड़े बेटे से वृद्धावस्था में हेल्प मिल जाती हैं. ये उनका दिल से ख्याल रखते हैं.

ज्योतिष में सप्तांश कुण्डली आपके बुढ़ापे के जीवन पर क्या प्रभाव करती है ये जानना बहुत जरूरी है

जन्म कुण्डली के पंचम भाव से संतान के बारे में पूर्ण रुप से विवेचन किया जाता है. इसी पंचम भाव के सूक्ष्म अध्ययन के लिए वैदिक ज्योतिष में सप्तांश कुण्डली का आंकलन किया जाता है. जन्म कुण्डली का पंचम भाव 30 अंश का होता है. इस 30 अंश को सात बराबर भागों में बाँटकर सप्ताँश कुण्डली बनाई जाती है.

सप्तांश कुण्डली से संतान पक्ष के बारे में विचार किया जाता है. इस कुण्डली से संतान का अच्छा बुरा सभी कुछ प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देता है. इस कुण्डली के सभी सात भागों का फलित भिन्न-भिन्न होता है.

पहला सप्तांश (क्षार) ) 0 डिग्री से 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक | First Saptansh (Kshar) From 0 degree to 4 degrees 17 minutes and 8 seconds

प्रथम सप्तांश 0 से लेकर 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक होता है. पहले सप्तांश को क्षार भी कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षार सप्तांश में हो तो इस सप्तांश को मिलेजुले परिणाम देने वाला माना गया है. पंचम भाव क्षार होने पर संतान माता पिता के लिए कष्ट प्रदान करने वाली हो सकती है .ऎसा होने पर  माता पिता को संतान पक्ष की ओर से अपमान या अपयश भी प्राप्त हो सकता है.

दूसरा सप्तांश (क्षीर) 4 डिग्री अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक | Second Saptansh (Kshir) From 4 degrees 17 minutes and 8 seconds to 8 degrees 34 minutes and 17 seconds

दूसरा सप्तांश 4 अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक होता है. दूसरे सप्तांश को क्षीर नाम से जाना जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षीर सप्तांश में हो तो संतान माता पिता की सेवा करने वाली हो सकती है. बच्चे माता पिता की वृद्धावस्था में सहायता करने वाले होते हैं. बुढापे में जब माता पिता को संतान की सेवा की अत्यधिक आवश्यकता होती है तब यदि संतान पूर्ण निष्ठा भाव से सेवा करती है तो यह माता पिता के लिए बहुत ही सुखदायक स्थिति होती है.

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड | Third Saptansh (Dadhi) From 8 degrees 34 minutes and 17 seconds to 12 degrees 51 minutes and 25 seconds

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड तक का होता है. तीसरा सप्तांश दधि कलहाता है. पंचम भाव या पंचमेश दधि में पडे़ तो संतान सुंदर और रुपवान होती है. अच्छे गुणों से युक्त हो कर्त्तव्य परायण एवं कोमल गुण वाली हो सकती है. संतान द्वारा अभिभावक को सुख और सम्मान की प्राप्ति होती है. व्यक्ति संतान के सुख को भोगता है.

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड | Fourth Saptansh (Aajya) From 12 degrees 51 minutes and 25 seconds to 17 degrees 8 minutes and 34 seconds

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड तक का होता है. चतुर्थ सप्तांश को आज्य कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश आज्य भाव में होने से संतान श्रेष्ठ गुणों से युक्त हो सकती है तथा माता पिता को भरपूर सूख देने वाली कही गई है. ऎसी संतान से माता पिता को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की प्राप्ति कराने में सक्षम हो सकती है.

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड | Fifth Saptansh (Ikshuras) From 17 degrees 8 minutes and 34 seconds to 21 degrees 25 minutes and 42 seconds

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड तक का होता है. पंचम सप्तांश को इक्षुरस भी कहते हैं. पंचम भाव या पंचमेश यदि इक्षुरस में हो तो संतान बौद्धिक क्षमता वाली एवं शिक्षा में तेज होती है. संतान पक्ष की ओर से माता पिता को कोई कष्ट प्राप्त नहीं होता. ऎसी संतान कुटुम्ब को साथ लेकर चलने वाली हो सकती है तथा परिवार में संतुलन एवं शांति बनाए रखने का प्रयास करती है.

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड | Sixth Saptansh (Madya) From 21 degrees 25 minutes and 42 seconds to 25 degrees 42 minutes and 51 seconds

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. छठा सप्तांश 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. यह सप्तांश मद्य के नाम से भी जाना जाता है. पंचम भाव या पंचमेश का संबंध जब मद्य सप्तांश से होता है तब माता पिता को संतान की ओर से कष्ट प्राप्त हो सकते हैं. षष्ठेश से संबंध बनने पर संतान में नशीले पदार्थों का सेवन करने की प्रवृत्ति हो सकती है. बच्चे की यह बुरी आदत माता पिता के लिए कष्टकारक होती है.

सातवां सप्तांश (शुद्ध जल) 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक | Seventh Saptansh (Shuddh Jal) From 25 degrees 42 minutes and 51 seconds to 30 degrees

सातवां सप्तांश 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक होता है. यह सप्तांश शुद्ध जल कहलाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश सातवें सप्तांश में आता है तो संतान शुभ फलों को प्रदान करने वाली हो सकती है. संतान की ओर से माता पिता का हृदय सदा प्रसन्नचित रहता है. ऎसी संतान माता पिता के सभी आदेशों का पालन करने वाली और उनकी सेवा करने वाली होती है.

शुक्र ग्रह

सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ज्योतिषशास्त्र में इस बात का जिक्र है कि जीवन के इन भावों के पीछे 9 ग्रहों की दशा जिम्मेदार है. जन्मपत्री में यदि ये ग्रह ठीक दशा में हैं तो जातक का भाग्य काफी अच्छा होता है. वहीं अगर यह ग्रह कुंडली के पाप भाव में हैं तो जातक का जीवन परेशानियों से भरा रहता है. कुंडली में शुक्र ग्रह की नीच दशा वैवाहिक जीवन में कलह, परेशानियों और संबंध विच्छेद का कारण बनती है. इसका स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. आइए जानते हैं शुक्र ग्रह के नीच भाव में होने से जातक को किन परेशानियों का समाना करना पड़ता है और ऐसे कौन से उपाय हैं जिनसे ग्रह दशी को ठीक किया जा सकता है. आइए जानते हैं:
शुक्र ग्रह से पीड़ित लोगों का बुढ़ापा काफी कष्ट में गुजरता है.
शुक्र ग्रह जहां भौतिक सुखों को देने वाला है वही जीवन जीने की शक्ति भी प्रदान करता है यदि कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति अच्छी है तो जातक जीवन पर्यंत सुख एवं वैभव के साथ जीता है |
यदि उपरोक्त भाव एवं ग्रह मजबूत ना हो तो भी धनेश एवं भाग्य का मजबूत होना परम आवश्यक माना गया है |
यदि आपके जीवन में पर्याप्त मात्रा में धन है तो भी वृद्धावस्था में आपकी सेवा करने के लिए अनेकों लोग तैयार रहते हैं इसलिए कुंडली में धन योग मजबूत होना चाहिए यदि आप चाहते हैं कि आपका जीवन वृद्धावस्था में सुख में एवं स्वस्थ रहे तो इसके लिए आपको सूर्य ग्रह की उपासना करनी चाहिए तथा विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ नियमित रुप से करना चाहिए |
वृद्धावस्था को सुखमय एवं खुशहाल बनाने के लिए धन का संचय भी आवश्यक है तथा स्वस्थ जीवन के लिए एकादशी व्रत का नियमित रुप से अनुपालन करना चाहिए |
ज्योतिष के माध्यम से कुंडली के ग्रहों के प्रभाव को जानते हुए उचित ज्योतिषीय निवारण करवाए और भविष्य के संभावित समस्याओं को जानते हुए अनुकूल जीवन शैली और विचारधारा अपनाए |
पुत्र भाव . भावेश एवं कारक ग्रहों को ज्योतिषीय माध्यम से अनुकूल बनाए और तत्वों को जप .तप , दान और रत्नो के द्वारा अनुकूल बनाए और वृद्धावस्था को ज्यादा से ज्यादा बेहतर बनाए |
सतकर्म ही हमारी सफलता और मोक्ष का मूल है और आध्यात्मिक ज्योतिष का यही सूत्र है-

सत्कर्मेण हन्यते व्याधि।

सत्कर्मेण हन्यते ग्रहा।।

सत्कर्मेण हन्यते शत्रु।

यतो सत्कर्म स्तुतो जय:।।

 
श्यामा गुरुदेव
ज्योतिर्विद एवं ज्योतिष सलाहकार

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