" /> पुरुषोत्तम मास 2020-अधिक मास क्या है?-इंडिया एस्ट्रोलॉजी फ़ाउन्डेशन ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव (आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं ज्योतिषीय चिंतक) |

क्यों आता है अधिक मास?

Adhik Mas 2020-Purshottam Month 2020 भारतीय पंचांग (खगोलीय गणना) के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है। यह सौर और चंद्र मास को एक समान लाने की गणितीय प्रक्रिया है। शास्त्रों के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। सूर्य की बारह संक्रांति होती हैं और इसी आधार पर हमारे चंद्र पर आधारित 12 माह होते हैं। हर तीन वर्ष के अंतराल पर अधिक मास या मलमास आता है। शास्त्रानुसार- यस्मिन चांद्रे न संक्रान्ति: सो अधिमासो निगह्यते तत्र मंगल कार्यानि नैव कुर्यात कदाचन्। यस्मिन मासे द्वि संक्रान्ति क्षय: मास: स कथ्यते तस्मिन शुभाणि कार्याणि यत्नत: परिवर्जयेत।।

अधिक मास क्या है?

जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती वह अधिक मास होता है। इसी प्रकार जिस माह में दो सूर्य संक्रांति होती है वह क्षय मास कहलाता है।

इन दोनों ही मासों में मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, परंतु धर्म-कर्म के कार्य पुण्य फलदायी होते हैं। सौर वर्ष 365.2422 दिन का होता है जबकि चंद्र वर्ष 354.327 दिन का होता है। इस तरह दोनों के कैलेंडर वर्ष में 10.87 दिन का फ़र्क़ आ जाता है और तीन वर्ष में यह अंतर 1 माह का हो जाता है। इस असमानता को दूर करने के लिए अधिक मास एवं क्षय मास का नियम बनाया गया है।

इस अनुसार गणना करें तो अगला पुरुषोत्तम मास कब और किस हिन्दू मास के साथ संयोग बनाएगा, जानते हैं। जानिए, कब से शुरू हो रहा है अधिकमास

 अधिकमास – गणना का आधार

काल निर्धारण में ‘वर्ष’ की गणना का मुख्य आधार सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का भ्रमण है। इससे ऋतुएँ बनती हैं। अत: सौर वर्ष का स्पष्टत: ऋतुओं के साथ सम्बन्ध है। एक वर्ष में प्राय: 365.256363 दिन होते हैं। सौर मान के अनुसार एक सौर संक्रांन्ति से दूसरी सौर संक्रांन्ति तक का समय एक सौर मास होता है किन्तु भारतीय पद्धति के अनुसार ‘चन्द्रमा’ से ‘मास’ गणना को निर्धारित किया जाता है, जिसका मान एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक (अमान्त मान के अनुसार) अथवा एक पूर्णमासी से दूसरी पूर्णमासी तक (पूर्णिमान्त मान के अनुसार) होता है। सावन के दिनों में चन्द्रमान की अवधि लगभग 29.5306 दिन होती है। अत: बारह चन्द्र मास वाले चन्द्रवर्ष में प्राय: 354.3672 दिन होते हैं। इस प्रकार चन्द्र वर्ष निरयण सौर वर्ष से लगभग 11 दिन कम होता है किन्तु वर्ष की गणना सौर वर्ष से ही की जाती है। भारतीय आचार्यों ने खगोलीय वैज्ञानिक विधि से चन्द्र एवं सौर मानकों में सामंजस्य करने के लिए ‘अधिमास’ या ‘मलमास’ जोड़ने की विधि का विकास किया, जिससे हमारे व्रत, पर्वोत्सव आदि का सम्बंध ऋतुओं और चन्द्र तिथियों से ही बना रहा। इस पद्धति का प्रचलन वैदिक काल से ही प्राप्त होता है। वहां बारह मासों के साथ तेरहवें मास की कल्पना स्पष्टतया प्राप्त होती है। उस समय में भी सौर और मास चन्द्र मास थे। वर्ष गणना का सहज साधन ऋतुओं का एक परिभ्रमणकाल और मास गणना का सहज साधन चन्द्रमा के दो बार पूर्ण होने की अवधि है। यही चन्द्र सौर प्रणाली विकसित रूप में हमारे यहाँ के परम्परागत पंचांगों में मिलती है।

अधिक मास – क्या होता है मलमास? अधिक मास में क्या करें क्या न करें?

 

अधिक शब्द जहां भी इस्तेमाल होगा निश्चित रूप से वह किसी तरह की अधिकता को व्यक्त करेगा। हाल ही में अधिक मास शब्द आप काफी सुन रहे होंगे। विशेषकर हिंदू कैलेंडर वर्ष को मानने वाले इस शब्द से खूब परिचित हैं। जब किसी मास में दिनों की संख्या दो मास के बराबर हो जाये तो वह अधिक मास होता है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसमें सूर्य एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच सूर्य का राशि परिवर्तन यानि संक्रांति नहीं होती। यानि कह सकते हैं कि जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती उस मास को अधिक मास, पुरुषोत्तम मास, मल मास आदि नामों से जाना जाता है। शास्त्रानुसार अधिक मास के आरंभ होते ही प्रात:काल स्नानादि से निबट स्वच्छ होकर भगवान सूर्य को पुष्प चंदन एवं अक्षत से मिश्रित जल का अर्घ्य देकर उनकी पूजा करनी चाहिये। इस मास में देशी (शुद्ध) घी के मालपुए बनाकर कांसी के बर्तन में फल, वस्त्र आदि सामर्थ्यनुसार दान करने चाहिये।  इस माह में मांगलिक कार्य नहीं किये जाते बल्कि व्रत, तीर्थ स्नान, भागवत पुराण, ग्रंथों का अध्ययन विष्णु यज्ञ आदि किये जा सकते हैं। जो कार्य पहले शुरु किये जा चुके हैं उन्हें जारी रखा जा सकता है। महामृत्युंजय, रूद्र जप आदि अनुष्ठान भी करने का विधान है। संतान जन्म के कृत्य जैसे गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत आदि संस्कार किये जा सकते हैं। पितृ श्राद्ध भी किया जा सकता है।

पुरुषोत्तम मास में व्रत की विधि

अधिक मास में व्रती को पूरे माह व्रत का पालन करना होता है। जमीन पर सोना, एक समय सात्विक भोजन, भगवान श्री हरि यानि भगवान श्री कृष्ण या विष्णु भगवान की पूजा, मंत्र जाप, हवन, हरिवंश पुराण, श्रीमद् भागवत, रामायण, विष्णु स्तोत्र, रूद्राभिषेक का पाठ आदि कर्म भी व्रती को करने चाहिये। अधिक मास के समापन पर स्नान, दान, ब्राह्मण भोज आदि करवाकर व्रत का उद्यापन करना चाहिये। शुद्ध घी के मालपुओं का दान करने का काफी महत्व इस मास में माना जाता है।

पुरुषोत्तम मास : जानिए तिथिनुसार कौन-सा करें दान…

 

अधिक मास की पुण्य तिथियां

अधिक मास की शुक्ल एकादशी पद्मिनी एकादशी तो कृष्ण पक्ष की एकादशी परमा एकादशी कहलाती हैं। मान्यता है कि इन एकादशियों के व्रत पालन से नाम व प्रसिद्धि मिलती है और व्रती की मनोकामना पूर्ण होने के साथ खुशहाल जीवन मिलता है।

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