ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ग्रह-नक्षत्र और देवी-देवता सभी उसके अधीन है।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ग्रह-नक्षत्र और देवी-देवता सभी उसके अधीन है। ईश्वर के बाद ईश्वर की प्रकृति महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार प्रकृति ने रोग, शोक या अन्य घटना, दुर्घटना को प्रदान किया उसी प्रकार उसने उक्त सभी से बचने के उपाय भी दिए हैं।

परन्तु

 अक्सर लोगो से एक बात सुनने को मिलती है कि ज्योतिष झूठ है ! हमारा तो विश्वास ही उठ चुका है ज्योतिष पर से ! ऐसा क्यूँ होता है ? क्या किसी ने इसकी वजह जानने की कोशिश की ? या वास्तव में ही ज्योतिषियों को अपने उपर विश्वास नहीं ? क्यूँ उनके दिये गए उपाय काम करते ? ऐसा क्यूँ होता है ?
जब भी जातक को कोई उपाय बताया वो चाहे किसी को रत्न धारण करने को कहा, किसी ने कोई पूजा/हवन/पाठ सुझाया, किसी ने दान देने को कहा या किसी ने और तरह का उपाय दिया ! लेकिन समस्या जस की तस रही ! क्या किसी ने इसकी वजह जानने की कोशिश की ?  शायद नहीं
ज्योतिष शास्त्र एक विस्तृत विद्या है, जो व्यक्ति के जीवन के हर पहलू उसके जीवन के हर आयाम को बड़ी गहराई के साथ छूती है। ज्योतिष शाखाओं के अंतर्गत मानव जीवन की समस्त परेशानियों का हल मौजूद है। जिनमें सबसे प्रचलित है कुंडली देखकर भविष्य जानना या फिर वर्तमान हालातों का पता लगाना।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ग्रह-नक्षत्र और देवी-देवता सभी उसके अधीन है। ईश्वर के बाद ईश्वर की प्रकृति महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार प्रकृति ने रोग, शोक या अन्य घटना, दुर्घटना को प्रदान किया उसी प्रकार उसने उक्त सभी से बचने के उपाय भी दिए हैं परन्तु……

सामान्य परेशान लोगों में से अधिकतर की शिकायत होती है कि, उनकी समस्या के लिए वे बहुतेरे ज्योतिषियों, तांत्रिकों, पंडितों से संपर्क करते हैं किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता या बहुत कम लाभ दृष्टिगोचर होता है, तथा उनकी परेशानी यथावत रहती है अथवा केवल कुछ समय राहत देकर फिर वैसी ही हो जाती है |

वे यहाँ वहां अपनी समस्या का समाधान पाने के चक्कर में घूमते रहते हैं पर कोई सही समाधान नहीं मिलता |अंततः थक हारकर मान लेते हैं की जो किस्मत में लिखा होता है वही होता है, या कोई उपाय काम नहीं करता, यह सब बेकार है अथवा मूर्ख बनाने के तरीके हैं, कुछ नहीं होता इन सब से | कुछ तो यहाँ वहां घूमते हुए खुद थोड़ी बहुत ज्योतिष समझने लगते हैं, टोने -टोटके आजमाते आजमाते, शाबर मंत्र, तांत्रिक मंत्र आदि पढ़कर, थोड़े बहुत टोने-टोटके जान जाते हैं ,कुछ मंत्र जान जाते हैं, कुछ पूजा पाठ, स्तोत्र आदि जान जाते हैं, फिर ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र की कुछ सडक छाप किताबों को पढ़कर, नेट पर खोज कर अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हुए खुद को ज्योतिषी और तांत्रिक मान लेते हैं |
समस्या उनकी ख़त्म हो न हो, उन्हें खुद राहत मिले या न मिले अपनी दौड़ भाग से पर वे स्वयं को ज्योतिषी, तांत्रिक अथवा पंडित साबित करने और फिर लोगों को खुद मूर्ख बनाने का काम शुरू कर देते हैं | नाम के आगे स्वामी, आचार्य, पंडित ,अघोराचार्य, कौलाचार्य, ज्योतिषाचार्य, शास्त्री, तंत्राचार्य, तांत्रिक लगाने लगते हैं और लोगों को टोटके, उपाय, मंत्र बांटने लगते हैं, धन लेकर उनके लिए अनुष्ठान, क्रिया करने को कहने लगते हैं और फिर इसे व्यवसाय बना लूटने का धंधा बना लेते हैं |

यह काम सोसल मीडिया ,इंटरनेट ,वेबसाईट के माध्यम से खूब होता है |सामान्य लोग समझ नहीं पाते अथवा वास्तविक ज्योतिषी, तांत्रिक, पंडित और इन छद्म नामो वाले ज्योतिषी, पंडित, तांत्रिक में अंतर नहीं कर पाते, अंततः वे खुद के धन का अपव्यय, हानि पाते हैं, खुद की किस्मत को कोसते हैं अथवा ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, उपायों को ही बेकार मान लेते हैं |उनका विश्वास हिल जाता है, कभी कभी भगवान् पर से भी विश्वास उठने लगता है |

एक दूसरी समस्या लोगों की नासमझी से भी उत्पन्न होती है |लोग कर्मकांड, पूजा पाठ, शादी विवाह, कथा कराने वाले पंडित जी से प्रवचन करने वाले व्यास या शास्त्री जी से, भागवत, रामायण कथा वाचकों से भविष्य जानने की कोशिश करते हैं और उपाय पूछते हैं | उनकी विशेषज्ञता पूजा पाठ, कर्मकांड, प्रवचन, कथा, भाषण कला में है न की ज्योतिष, तंत्र आदि भविष्य जानने वाली गूढ़ विद्याओं में |इनके उपाय पूजा पाठ, दान, गौ, नदी, पीपल, अनुष्ठान तक सीमित रहेंगे न की मूल समस्या को पकड़ वहां प्रतिक्रिया करने वाले उपायों पर |
आजकल ज्योतिष, तंत्र को व्यसाय और धनोपार्जन का स्रोत मान ही अधिकतर लोग आकर्षित हो रहे |साधुओं,मठाधीशों के आसपास भीड़ देखकर लोग आकर्षित हो रहे और इसे बिना कुछ किये ऐश्वर्य, सुख का साधन मान इसमें घुस रहे |बड़े लोग पैसे देकर भी बड़े बड़े पंथों में पद पा रहे | जब उद्देश्य ही केवल लाभ कमाना हो, सुख सुविधा के साधन जुटाना हो, भोग, भौतिक लिप्सा की पूर्ती हो, गंभीर साधना उद्देश्य ही न हो तो यह कितना लाभ पहुंचाएंगे सोचने की बात है | न रूचि होती है, न लगन कुछ जानने समझने की अतः रटे रटाये उपाय, पूजा पाठ, दान बता दिए | न क्षमता है समस्या पकड़ने की न रूचि है कुछ समझने में अतः अक्सर तीर तुक्के साबित होते हैं, पर इनके प्रभामंडल के आगे व्यक्ति कुछ सोच भी नहीं पाता और अपने भाग्य को ही दोषी मानता रह जाता है | अब इतने बड़े आडम्बर वाले गुरु जी, ज्योतिषी जी, पंडित जी, तांत्रिक अघोरी महाराज गलत थोड़े ही बोलेंगे, हमारा ही भाग्य खराब है जो कोई उपाय काम नहीं कर रहा |
 तंत्र, ज्योतिष, कर्मकांड, पूजा पाठ, साधना एक श्रम साध्य,शोधोन्मुख कार्य है |इनमे समय, एकाग्रता लगती है |गहन अध्ययन, मनन, चिन्तन और साधना करनी होती है | पुराने समय से देखें तो किसी गुरु के केवल एक दो शिष्य ही उनसे पर्याप्त ज्ञान ले पाते थे | जो पूर्ण ज्ञान लेते थे वे खुद गहन साधना में संलग्न हो जाते थे और समाज से कम संपर्क हो जाता था |जो कम ले पाते थे अथवा स्वार्थ और उद्देश्य विशेष से गुरु से जुड़ते थे, वे अधिक सामाजिक संपर्क में होते थे |उनके पास ज्ञान,अनुभव कम होता था पर सामाजिकता और वाक-चातुर्य अधिक होता था अतः नाम और भीड़ अधिक होती थी, जबकि मुख्य शिष्य गुमनाम रह अपनी साधना में लिप्त रहता था | गुरु से अपूर्ण ज्ञान ले पाने वाले,स्वार्थ और उद्देश्य विशेष से गुरु बनाने वाले शिष्यों की संख्या भी अधिक होती थी | धीरे धीरे क्रमिक गुरु परम्परा में योग्य शिष्यों ,साधकों की कमी होती गयी,जो थे वे चुपचाप अपनी साधना,अध्ययन करते, ज्ञान खोज में सुख पाते गुमनाम रहे और कम ज्ञान वाले अथवा स्वार्थी, भौतिक लिप्सा युक्त शिष्यों की भरमार होती गयी | आज तक आते आते, वास्तविक साधक खोजे नहीं मिलता, सही गुरु की तलाश वर्षों करनी होती है जबकि हर गली और हर शहर में ढेरों गुरु और साधक मिल जाते हैं | बड़े बड़े नाम ,उपाधि वाले साधक, ज्योतिषी, गुरु मिल जाते हैं जिनके पास लाखों हजारों की भीड़ भी होती है, अनुयायी होते हैं | फिर भी लोगों की समस्याएं बढती ही जा रही ,उनको सही उपाय नहीं मिल पा रहे, वे भटक भटक कर अंततः ज्योतिष, तंत्र, पूजा पाठ, कर्मकांड, साधना को अविश्वसनीय मान लेते हैं,  कुछ का तो भगवान् पर से भी विश्वास उठ जाता है | 

 न तंत्र -मंत्र गलत होते हैं, न ज्योतिष गलत होती है, न कर्मकांड अनुपयोगी हैं, यहाँ समस्या केवल इतनी होती है की सही समस्या पर सही पकड़ नहीं होती और सही उपाय नहीं किये अथवा बताये गए होते |

तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, पूजापाठ, कर्मकांड का अपना एक पूरा विज्ञान होता है और यह शत प्रतिशत प्रभावी होते हैं | इनके पीछे हजारों वर्षों का शोध होता है | इनकी अपनी तकनिकी, ऊर्जा और प्रतिक्रियाएं होती हैं, पर यह सब पकड़ने और जानने के लिए कई वर्षों तक स्वयं को समझना पड़ता है, खुद शोध और साधना करना पड़ता है, खुद परीक्षित करना होता है | किताबी बातों को परखना होता है, खुद प्रेक्टिकल करना होता है | जाहिर है इन सबमे कई वर्ष लगते हैं | तब जाकर कुछ हाथ लगना शुरू होता है | केवल किताबें पढकर कोई ज्योतिषी, तांत्रिक, पंडित, साधक नहीं हो सकता |ऐसा होता तो किताबें लिखने वाले खुद सबसे बड़े पंडित, तांत्रिक, ज्योतिषी होते पर ऐसा नहीं होता |

अक्सर कई किताबों से सामग्री लेकर ही नई किताब लिखी होती है और मूल किताबें भी कई साधकों के छोटे छोटे अनुभवों का संकलन ही होती हैं |

ज्योतिष की बात करें तो ग्रह योगों से निर्मित भाग्य यहाँ सबसे मुख्य होता है | 99 प्रतिशत भाग्य में परिवर्तन सम्भव होता है और इसी आधार पर ज्योतिष में पुरातन काल से ही उपायों की अवधारणा विकसित हुई और बनाई गयी | एक प्रतिशत भाग्य अपरिवर्तनीय होता है,क्योकि उसे सुधारने को जितनी ऊर्जा, शक्ति, कर्म चाहिए वह इस जन्म में संभव नहीं होती अथवा उसको सुधारने का समय बीत चूका होता है | केवल अत्यंत उच्च साधक ही खुद के लिए इसे परिवर्तित कर सकता है,सामान्य लोग नहीं | 99 प्रतिशत सुधारने योग्य भाग्य अथवा समस्या में भी केवल कुछ प्रतिशत ही उसे सुधार पाते हैं जबकि अधिकतर को सही उपाय नही मिलता अथवा वे भटकते हुए सही समाधान नहीं पाते |
यहाँ समस्या यह होती है की ज्योतिषी गहन विश्लेष्ण नहीं करता, सूक्ष्म अध्ययन नहीं करता, रटे रटाये और सरसरी तौर पर कुंडली देख घिसे पिटे उपाय घुमा फिराकर बता दिया | सब जगह शनी, राहू केतु को ही समस्या का कारण मान लिया | काल सर्प, साढ़ेसाती, मांगलिक दोष का हौवा खड़ा किया और उपाय बता दिए | अब सूक्ष्म विश्लेषण में समय लगेगा, ज्ञान चाहिए, अनुभव चाहिए |समय कौन खर्च करे उतने में दुसरे क्लाइंट को देखेंगे |वर्षों का खुद का शोध, अनुभव है नहीं, जो रटा रटाया है बता दिया | कब दान करना चाहिए, कब किसका रत्न पहनना चाहिए, कब किस तरह का क्या हवन, जप, मन्त्र, शक्ति आराधना करनी चाहिए, किस शक्ति उपाय का कहाँ क्या प्रभाव होगा और उसका अन्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह समझे बिन उपाय काम नहीं करेगे | कितनी शक्ति से कौन ग्रह प्रभावित कर रहा, उसके लिए कितनी शक्ति का उपाय करना करना चाहिए, इस उपाय से अन्य ग्रहों के संतुलन पर क्या प्रभाव होगा देखना आवश्यक होता है |
आज भी वास्तविक ज्ञानी ज्योतिषी पैसा नहीं कमा पाता क्योकि उसे विश्लेष्ण को समय चाहिए, अध्ययन को समय चाहिए, शोध को समय चाहिए, चिंतन मनन समझने को समय चाहिए | इनके बिन उसे संतुष्टि ही नहीं मिलेगी, इसलिए अक्सर वह शांत और गुमनाम रह जाता है जबकि आडम्बरी, बड़े आफिस वाले, लम्बी चौड़ी डिग्री वाले, वेशभूषा बनाए, रोज किसी न किसी विषय पर बोलने वाले, दिन भर नेट पर, सोसल मीडिया पर घुमने वाले, भीड़ भाड़ वाले ज्योतिषियों की भरमार है |
तंत्र, पांडित्य, कर्मकांड, साधना क्षेत्र की स्थिति और अधिक दयनीय है | यहाँ तो वास्तविक साधक ही खोजना दुरूह है | जो मिलेगा उसके नाम बड़े होंगे, वह अघोराचार्य, कौलाचार्य, स्वामी, परमहंस, तांत्रिक, तन्त्रचार्य होगा पर बताता टोटके और शाबर मंत्र मिलेगा | खुद शाबर का प्रयोग करता मिलेगा, टोटके, टोने, अभिचार और भौतक लिप्सायुक्त, भेष बनाये, भीड़ -शिष्य पसंद, शानो शौकत युक्त, अपनी साधना, खुद के फोटो सार्वजनिक करता, खोपड़ी, श्मशान के फोटो पोस्ट करता मिलेगा |  वास्तविक साधक, महाविद्या साधक, कुंडलिनी साधक के पास न इतना समय होता है न रूचि |
यहाँ तो समस्या सुनी बस बोल दिया इतना लगेगा, ये कर देंगे आपकी समस्या समाप्त हो जायेगी, या इतना फीस दो ये उपाय करो ठीक हो जाएगा, अमुक ताबीज हम भेज देंगे आप ठीक हो जायेंगे, आपका काम हो जाएगा |न ठीक से समझा, न ठीक से विश्लेष्ण किया, न कुलदेवता, पितरों, अभिचार, बाहरी अथवा घरेलु बाधा देखी, न खुद व्यक्ति की गलतियों कमियों का विश्लेषण किया, न यह देखा की वह किसकी पूजा कर रहा, उसके परिवार में क्या पूजा जा रहा या कहीं खानदानी समस्या तो नहीं उत्पन्न हो रही, बस टोटके बता दिए, स्तोत्र या मन्त्र बता दिए या अनुष्ठान को बोल दिया, ताबीज को बोल दिया | समस्या है कहाँ यह देखने की किसको फुर्सत या पकड़ पाते हैं या नहीं, मतलब नहीं |
एक ही लक्षण के पीछे कई कारण सम्भव है, जरुरी नहीं की सबको अभिचार, भूत प्रेत, किये कराये की ही समस्या हो | घर में पूजे जा रहे शक्ति भी पूजा न मिलने पर समस्या उत्पन्न करते हैं | कुलदेवता/देवी के कारण भी सुरक्षा खत्म हो जाती है ,पित्र भी बाधा देते हैं, पितरों के साथ जुड़ गयी शक्तियां भी बाधा देती हैं, खुद की गलतियों से रुष्ट शक्तियाँ भी समस्या उत्पन्न करती है | कभी कभी किसी ऊर्जा का अधिक हो जाना भी समस्या उत्पन्न करता है | इन सबका ठीक से विश्लेष्ण किये बिना उपाय बताना व्यक्ति को लाभ नहीं पहुचाता |जितनी शक्ति किसी समस्या के पीछे है उससे अधिक शक्ति अगर उसके विपरीत लगाईं जायेगी तभी वह समस्या समाप्त होगी | कम शक्ति लगाने पर समस्या समाप्त भी नहीं होगी ,और विपरीत प्रतिक्रया से और समस्या बढ़ा भी सकती है |सांप को छेड़ कर छोड़ देने पर वह काटेगा ही |कभी कभी समस्या किसी और कारण और उपाय किसी और का होने से भी उपाय काम नहीं करते या एक ही तरह की शक्ति, देवता, ऊर्जा से सभी को संतुलित करने का प्रयास भी काम नहीं करता | नकारात्मकता के उपयुक्त ऊर्जा लगाने पर ही परिणाम मिलता है | कभी कभी गलत उपाय एक नई समस्या उत्पन्न कर देते हैं | हर उपाय के पीछे ऊर्जा विज्ञानं होता है और अलग उर्जा असंतुलन उत्पन्न कर देती है | एक साथ कई उपाय करने से भी समस्या ठीक नहीं होती क्योकि कई तरह की उर्जायें असंतुलन उत्पन्न करती है और अलग अलग कार्य करती हैं जिससे उलझन बढने की सम्भावना होती है | कई शक्तियों का एक साथ प्रयोग भी असंतुलन उत्पन्न करता है, कभी कभी प्रतिक्रिया भी मिलती है | अधिक करने में गलतियों की सम्भावना भी अधिक होती है जिसके अधिक घातक दुस्परिनाम होते हैं | समस्या ख़त्म होने की बजाय और बढ़ जाती है |
यह मानकर चलिए की अन्तर्यामी और त्रिकाल दर्शी समाज में उपलब्ध नहीं रहते |अगर किसी के पास यह शक्ति हो तो भी वह समाज से दूर हो जाएगा |समाज में भविष्य ज्योतिष से पता चलता है, भूत काल बताने वाली अनेक पद्धतियाँ और शक्तियाँ है | भूत काल बताना आसान होता है जबकि भविष्य बताना सबसे कठिन | भविष्य बताने का दावा करने वाले अधिकतर तांत्रिक, साधक मूर्ख बनाते हैं | कर्ण पिशाचिनी, कर्ण मातंगी, वामकी अथवा समान किसी आत्मिक या प्रेतिक शक्ति के सहारे आपके भूत काल की बात सही बता कर भविष्य का तुक्का लगाते हैं जो कभी सही कभी गलत होता है | इस सभी शक्तियों के पास भविष्य में झाँकने की क्षमता नहीं होती | अतः ऐसे लोगों के बताये उपाय भी भविष्य के लिए कारगर नहीं होते, हाँ तात्कालिक भूत प्रेत की समस्या को ये बता सकते हैं | उच्च शक्ति अगर किसी को परेशान कर रही तो यह उसका समुचित उपाय नहीं बता सकते इसलिए उपाय कारगर नहीं होते | इन शक्तियों के सहारे स्वयं को बड़ा सिद्ध दिखाकर भीड़ तो लगाईं जा सकती है, रुपया कमाया जा सकता है, पर लोगों का भला कम ही हो पता है |
ऐसा ही चौकियों अथवा ओझा, भगत, गुनिया के साथ होता है | आजकल यह प्रचालन जोरों पर है की मंदिर के सामने अथवा मंदिर और देवता के नाम पर भूत प्रेत दूर करना |वास्तव में यहाँ आत्मिक शक्तियाँ ही काम करती हैं | इनसे भूत प्रेत जैसी छोटी शक्तियों में कुछ राहत मिल सकती है पर जिन्न, ब्रह्म, देवता आदि पर यह कारगर नहीं होती | इसलिए उपाय भी काम नहीं करते | बेहतर होता है की उच्च शक्तियों अथवा उग्र महाविद्याओं के साधकों से सम्पर्क किया जाए |
कुछ लोग यहाँ वहां पढकर भी उपाय करते रहते हैं या यहाँ वहां घुमते रहते ,दिखाते रहते हैं तथा अनेक उपाय आजमाते रहते हैं |इससे समस्या हल हो जाए जरुरी नहीं होता, क्योकि सही संतुलित उर्जा सही दिशा में लगाना आवश्यक होता है ,नहीं तो व्यतिक्रम उत्पन्न होता है और समस्या में बढ़ोत्तरी भी सम्भव होती है | कई प्रकार के उपायों, मन्त्रों से आपसी प्रतिक्रिया की भी सम्भावना होती है | उपाय या पूजा पाठ, मन्त्र आदि के लिए एक निश्चित और लम्बी अवधि चाहिए होती है तभी पर्याप्त ऊर्जा सही दिशा में लग पाती है और काम हो पता है |
न अधिक या कई तरह के उपाय करना चाहिए,न बार बार बार बदलाव करना चाहिए ,न यहाँ वहां घूमना चाहिए न खुद पढकर कोई उपाय करना चाहिए | उपाय करने से पहले ठीक से योग्य जानकार से उसका विश्लेषण कराना चाहिए, समझना चाहिए की आखिर समस्या है कहाँ और कोशिश यह करनी चाहिए की उपाय खुद किये जाएँ बजाय किसी और से कराने के | बार बार ज्योतिषी, तांत्रिक, पंडित न बदलना चाहिए न अनेक से सुझाव लेना चाहिए अपितु पहले ही खूब सोच समझकर, जांचकर किसी को अपनी समस्या दिखानी चाहिए और फिर लगकर कुछ महीनो तक एक दो उपायों को ही करना चाहिए ताकि उसकी पर्याप्त ऊर्जा मिल जाए | बार बार देवता, शक्ति, मन्त्र में बदलाव नहीं करना चाहिए और इनके जप पूजा खुद करने चाहिए | बजाय नेट पर किसी से कुछ पूछने के व्यक्तिगत सम्पर्क को वरीयता देनी चाहिए |पहले ज्ञानी को समझना चाहिए फिर ज्ञान लेना चाहिए |आडम्बर, भीड़, उपाधि की बजाय उसके ज्ञान और उसके व्यक्तित्व को परखना चाहिए | जरुरी नहीं की आडम्बर, वेश भूषा, भीड़ या उपाधि उनके ज्ञान को प्रदर्शित करता हो, आजकल यह सबसे आसान व्यवसाय हो गया है |
………उपाय कई तरह के होते है ,,रत्न धारण करना ,दान करना ,वस्तु प्रवाहित करना ,मंत्र जप -पूजा -अनुष्ठान ,रंगों -वस्त्रों का उपयोग -अनुपयोग,वनस्पतियों को धारण करना ,विशिष्ट पदार्थो का हवन आदि मुख्य रूप से उपायों के रूप में बताए जाते है, इनके रत्नों का प्रभाव असंदिग्ध है, रत्न वातावरण से सम्बंधित ग्रह कए रंग और प्रकाश किरणों को अवशोषित या परावर्तित करते है, ये त्वचा के संपर्क में रहकर सम्बंधित विशिष्ट उर्जा को शरीर में प्रवेश देते है, जिससे सम्बंधित ग्रह की रश्मियों का प्रभाव शरीर में बढ़ जाता है और तदनुरूप रासायनिक परिवर्तन शरीर में होने से व्यक्ति के सोचने और कार्य करने की दिशा कए साथ ही क्षमता भी बदल जाती है, जिससे वह सम्बंधित क्षेत्र में अग्रसर हो सफल हो पाता है, अब यहाँ यह भी होता है की रत्न जो उपयोग में लिया जा रहा है वह ही नकली हो, या उसकी बनावट में खराबी हो, टुटा या दाग धब्बे युक्त हो, या गलत स्थान पर गलत धातु के साथ पहन लिया गया हो, तो वह काम नहीं करेगा या नुक्सान भी कर सकता है.

………….दूसरा मुख्या उपाय दान करना बताया जाता है, दान एक पूर्ण भावनात्मक उपाय है, दान करने या वस्तु प्रवाहित करने में सामान्यतया यह किया जाता है की बताई गयी वास्तु उठाई और जो भी अपनी समझ से जरूरतमंद दिखा या जाती विशेष का व्यक्ति दिखा दान दे दिया ,यह तो दान है ही नहीं, अब परिणाम कैसे मिलेगा, दान करने से पूर्व मन में भावना होनी चाहिए की में यह वस्तु दान में दे रहा हूँ तो इससे उस जरूरतमंद व्यक्ति जिसे यह दान दिया जा रहा है की जरूरते पूरी होगी और वह आशीर्वाद देगा, आप केवल वस्तु का चयन कर सकते है अपने अनुसार देते समय, भावना भी उससे जुडी हो, इसमें सबसे मुख्य है सुपात्र का चयन जिसे आप दान दे रहे है, दान लेनेवाला यदि आपके दान से प्राप्त वस्तु से शराब पिता है, मांसाहार करता है, उसका गलत उपयोग करता है तो आप उसके पाप में भागीदार हो जाते है और आपके दान का उपाय आपका ही नुक्सान कर सकता है, दान लेने वाला व्यक्ति यदि कुकर्मी है, गलत है मध, मांसाहारी है, पापी है तो उसके मष्तिष्क से उत्पन्न तरंगे भी नकारात्मक उर्जा वाली होगी और उसका दिया आशीर्वाद आपके भाग्य में सकारात्मक उर्जा का संचार नहीं कर सकता, इसी प्रकार जब आप वस्तु का दान देते है तो वस्तु से सम्बंधित ग्रह रश्मियों की अधिकता आपके शरीर से वास्तु में आपकी भावना कए साथ प्रवेश करती है और दान देने पर आपके शरीर से दूर होती है जिससे उस ग्रह का प्रभाव कम होता है.
……सबसे महत्वपूर्ण उपाय ग्रहों के लिए देवी-देवता या ग्रह का मंत्र जप बताया जाता है, जब व्यक्ति मंत्रजाप करता है तब मंत्र की ध्वनि नादों से उर्जा उत्पन्न होती है जो वातावरण की सम्बंधित क्षेत्र की उर्जा से संपर्क करने के साथ ही शरीर में स्थित उस मंत्र से सम्बंधित विशिष्ट चक्र को प्रभावित करती है, मंत्र जप के समय व्यक्ति की एकाग्रता, तल्लीनता, भावना से मानसिक तरंगे तीब्रता से निकलती है और प्रकृति में उपस्थित उसी प्रकार की तरंगों को आकर्षित करती है जिससे उर्जा की मात्रा व्यक्ति के शरीर और आसपास के वातावरण में बढ़ जाती है और ग्रह का प्रभाव काम हो जाता है या अधिक हो जाता है या संतुलित हो जाता है,[यह मंत्र की प्रकृति पर निर्भर होता है ], अब मंत्र जप के समय यदि यंत्रवत सपाट स्वरों में जप हो, और मन इधर-उधर भागता रहे, मष्तिष्क एकाग्र न हो , इष्ट या मंत्र के आराध्य में विश्वास न हो, भावना इष्ट या लक्ष्य से न जुडी हो , संदेह हो की पता नहीं काम होगा या नहीं, तो मंत्र जप से कोई उर्जा प्राप्त नहीं होगी, आपके मस्तिष्क से कोई उर्जा उत्पन्न नहीं होगी और प्रकृति से कोई उर्जा आकर्षित नहीं होगी, फलतः मंत्र जप का उपाय काम नहीं कर पायेगा ,,,उपायों के काम नहीं करने का मूल में यही कारण, भावना, सही चयन आदि है , व्यक्ति की भावना, विश्वास, श्रद्धा, सही दिशा, समय, सही वस्तु का चयन, सही पात्र का चयन उपायों में मुख्या होते है, यह सही हो तो उपाय काम करते ही करते है

हमारा सभी मित्रों से अनुरोध है कि जिस तरह आप बीमारी से ग्रस्त होने पर अच्छे डाक्टर का चुनाव करते हैं, वैसे ही जन्म कुंडली भी विद्वान को ही दिखाए,कुछ समय भी दे उसे उपचार के लिए,ज्योतिष उपाय अंग्रेजी दवा की भांति काम नहीं करते, फ्री सेवा की अपेक्षा से बचें, तभी कल्याण सम्भव है

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This Post Has One Comment

  1. Rajendra singh hada

    Guruji mujhe mere bare me puchana hai.meri life kafi time se disturb chal rahi hai.financially, mentally, physically koi upay ho toh bataye taki aapke madyam se me kuch aaram pa saku.mene aapse kafi bar aapse bat karne ki bhi koshis ki per aapse bat hi nahi ho pati hai.mene aapse whatsapp pe bhi sampark kiya per koi response nahi hai.jai shri krishna

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