क्या आपकी भी जन्मकुंडली में ग्रह अस्त और मृत अवस्था में है? जानें कैसे करें उन्हें बलशाली

ग्रहों की एक विशेष गति होती है. जिसमे वे तमाम ग्रहो से मिलते रहते है. इस प्रकार योगों का निर्माण होता है. इसमें ग्रहों का संयोग सूर्य से भी होता है. जिसमे सूर्य के प्रभाव से गृह कभी-कभी अस्त हो जाते है. जब कोई ग्रह अस्त हो जाता है तो उसके अन्दर कोई शक्ति नहीं रह जाती.
अगर ग्रह नुकसानदायक है तो अस्त होने पर वो नुकसान नहीं पहचानता. अगर ग्रह लाभदायक है तो अस्त होने पर लाभ भी नहीं दे सकता. सूर्य कभी अस्त नहीं होता और बुध सबसे ज्यादा अस्त होता रहता है.
अस्त ग्रहों का अध्ययन किए बिना कुंडली धारक के विषय में की गईं कई भविष्यवाणियां गलत हो सकती हैं, इसलिए इनकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। आइए देखते हैं कि एक ग्रह को अस्त ग्रह कब कहा जाता है तथा अस्त होने से किसी ग्रह विशेष की कार्यप्रणाली में क्या अंतर आ जाता है।
 आकाश मंडल में कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है तथा इस ग्रह को अस्त ग्रह का नाम दिया जाता है।
प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता डिग्रियों में मापी जाती है तथा इस मापदंड के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दूरी के अंदर आने पर अस्त हो जाता है

चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

बुध सूर्य के दोनों ओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते।

   किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने की स्थिति में उसके बल में कमी आ जाती है तथा वह किसी कुंडली में सुचारू रुप से कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाता। किसी भी अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के लिए उस ग्रह का किसी कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली विशेष में बल तथा अस्त ग्रह की सूर्य से दूरी देखना आवश्यक होता है।
तत्पश्चात ही उस ग्रह की कार्य क्षमता के बारे में सही जानकारी प्राप्त हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में  चन्द्रमा सूर्य से 11 डिग्री दूर होने पर भी अस्त कहलाएंगे तथा 1 डिग्री दूर होने पर भी अस्त ही कहलाएंगे, किन्तु पहली स्थिति में कुंडली में चन्द्रमा का बल दूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के पास आ जाता है, उतना ही उसका बल क्षीण होता जाता है।
इसलिए अस्त ग्रहों का अध्ययन बहुत ध्यानपूर्वक करना चाहिए जिससे कि उनके किसी कुंडली विशेष में सही बल का पता चल सके।
        अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से चलने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है। यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह  अस्त होने के साथ साथ स्वभाव से शुभ फलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे आसान तथा प्रभावशाली उपाय है, कुंडली धारक को उस ग्रह विशेष का रत्न धारण करवा देना। रत्न का वज़न अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के बाद ही तय किया जाना चाहिए। इस प्रकार उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है जिससे वह अपना कार्य सुचारू रूप से करने में सक्षम हो जाता है। 
                               किन्तु यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को उसके रत्न के द्वारा अतिरिक्त बल नही दिया जाता क्योंकि किसी ग्रह के अशुभ होने की स्थिति में उसके रत्न का प्रयोग सर्वथा वर्जित है, भले ही वह ग्रह कितना भी बलहीन हो।

ऐसी स्थिति में किसी भी अस्त ग्रह को बल देने का सबसे बढ़िया तथा प्रभावशाली उपाय उस ग्रह के यंत्र तथा मंत्र बहुत अच्छे उपाय सिद्द हो सकते हैं जिनके उचित प्रयोग से कुंडली के अशुभ ग्रहों को शांत किया जा सकता है तथा उनसे लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। 

ऐसी स्थिति में उस ग्रह के मंत्र का निरंतर जाप करने से या उस ग्रह के मंत्र से पूजा करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता ही है, साथ ही साथ उसका स्वभाव भी अशुभ से शुभ की ओर बदलना शुरू हो जाता है। मंत्रों के प्रयोग की प्रक्रिया कठोर नियमों तथा अनुशासन का पालन करने की मांग करती है जिसके चलते जन साधारण के लिए इस प्रक्रिया का अभ्यास अति कठिन है। वहीं दूसरी ओर यंत्रों का प्रयोग रत्नो की भांति ही सहज तथा सरल है जिसके कारण अधिकतर जातक यंत्रों के प्रयोग से लाभ ले सकते हैं। मंत्रों की तुलना में यंत्र कहीं कम नियम तथा अनुशासन की मांग करते हैं तथा इसके अतिरिक्त यंत्र, पूजा की तुलना में बहुत सस्ते भी होते हैं जिसके चलते सामान्य जातक के लिए इनका प्रयोग सुलभ है तथा इसी कारण यंत्रों का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

 ||अस्त ग्रहो को ठीक करने के लिए क्या करना चाहिए??||

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अस्त ग्रहों के फल और उनकी दशा-अंतर्दशा के परिणाम

चंद्रमा

चंद्रमा के अस्त होने पर तमाम तरह की मानसिक समश्याए होने लगती है. कभी-कभी मिर्गी या मानसिक दौरे की बीमारी हो जाती है. व्यक्ति को स्त्री और माता का सुख नहीं मिल पाता. महिलाओं में विशेष तरह के रोग हो जाते हैदि द्वादशेश का प्रभाव हो तो जातक किसी लंबी बीमारी या नशे . यदि जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा अष्टमेश के पापों के प्रभाव में हो तो व्यक्ति दीर्घकाल तक अवसादग्रस्त रहता है और यइत्यादि का शिकार हो जाता है। चन्द्रमा के अस्त होने पर जातक की मां का अस्वस्थ होना, पैतृक संपत्ति का नष्ट होना, मानसिक अशांति आदि घटनाएं घटित होती रहती हैं। अगर चंद्रमा अस्त है तो महिलाओं का विशेष सम्मान करे. चांदी किसी न किसी रूप मैं जरूर पहने. शिव जी की उपासना करे.

मंगल

मंगल के अस्त होने पर उसकी अंतर्दशा में जातक को नसों में दर्द , उच्च अवसाद, खून का दूषित होना आदि बीमारियां हो सकती हैं। अस्त मंगल ग्रह पर षष्ठेश के पाप का प्रभाव होने पर जातक को कैंसर, विवाद में हानि चोटग्रस्त आदि कष्ट होते हैं और यदि अष्टमेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक भ्र्ष्टाचारी, घोटाले करने वाला बन जाता है। अस्त मंगल पर राहु-केतु का प्रभाव होना जातक को किसी मुकदमें आदि में फंसा सकता है। मंगल के अस्त होने पर आत्मविश्वास और साहस में कमी आ जाती है. व्यक्ति के संबंध परिवारवालों के साथ अच्छे नहीं रहते. व्यक्ति के अंदर कभी-कभी अपराध की प्रवृति आ जाती है. अगर मंगल दोष है तो वो प्रभावहीन हो जाता है. मंगल अस्त है तो जमीन पर सोए या लो फ्लोर के पलंग पर सोए. तांबा किसी न किसी रूप मैं जरूर पहने. हनुमान जी की उपासना करे.
बुध
जातक की कुंडली में बुध अष्टमेश के पाप के प्रभाव में हो तो जातक को दमा, मानसिक अवसाद, किसी प्रिय की मृत्यु का दुःख आदि से गुजरना पड़ता है। अस्त बुध की अंतर्दशा में जातक को धोखे का शिकार होता है। जिससे वह तनावग्रस्त रहता है, मानसिक अशांति बनी रहती है तथा जातक को चर्म रोग आदि भी हो सकता है। बुध के अस्त होने पर व्यक्ति की बुद्धि तीव्र नहीं होती. व्यक्ति सही फैसला नहीं ले पाता. व्यक्ति हमेशा वहम और दुविधा से घिरा रहता है. व्यक्ति नकारात्मक विचार रखने लगता है. नियमति रूप से गायत्री मंत्र का जाप करे. बिना तेल मसाले के हरी सब्जियों का प्रयोग करे. आप भगवान गणेश या माँ दुर्गा की उपासना कर सकते है.


बृहस्पति


अस्त बृहस्पति की अंतर्दशा आने पर जातक का मन अध्ययन में नहीं लगता वह लीवर की बीमारी से भी ग्रसित हो सकता है अन्य दूषित ग्रहों का प्रभाव होने पर जातक संतान सुख से वंचित रह जाता है। यदि कुंडली में अस्त बृहस्पति पर षष्ठेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक को मधुमेह, ज्वर आदि हो सकता है वह किसी मुकदमें आदि में भी फंस सकता है। अष्टमेश का प्रभाव होने पर किसी प्रियजन का वियोग होता है और द्वादशेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक अनैतिक संबंधों में फंस जाता है। बृहस्पति के अस्त होने पर व्यक्ति तामसिक वृतियों का शिकार हो जाता है. व्यक्ति को पेट की गंभीर समश्याए हो सकती है. महिला है तो विवाह होने में और चलाने में बड़ी मुश्किल आती है. सूर्य को नियमति रूप से हल्दी मिलाकर जल चढ़ाए. किसी न किसी रूप मैं स्वर्ण जरुर धारण करे. बुजुर्गो की सेवा और सहायता करे.

शुक्र

कुंडली में अस्त शुक्र ग्रह की अंतर्दशा में जातक का जीवनसाथी रोगग्रस्त हो सकता है। जातक को किडनी आदि से सम्बंधित परेशानी हो सकती है। संतानहीन हो जाने का भय रहता है। अस्त शुक्र का राहु-केतु के प्रभाव में होना जातक की समाज में प्रतिष्ठा के कम होने का संकेत देता है। यदि अस्त शुक्र अष्टमेश के पाप के प्रभाव में दाम्पत्य जीवन में कटुता आती है। द्वादशेश के पाप के प्रभाव में हो तो नशे का आदि होता है। शुक्र के अस्त होने पर व्यक्ति को किसी भी प्रकार का सुख नहीं मिलता. दाम्पत्य सुख नहीं मिलता. व्यक्ति का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नहीं रहता. व्यक्ति को आँखों और मधुमेह की समश्या होने की सम्भावना बन जाती है. नियमति रूप से दही का सेवन करे. सुबह स्नान करने के बाद हलकी सी सुगंध जरूर लगाये. माँ लक्ष्मी की उपासना करे.

शनि


अस्त शनि ग्रह का षष्ठेश की पापछाया में होना रीढ़ की हड्डी में परेशानी, जोड़ों में दर्द आदि समस्या उत्पन्न करता है। अष्टमेश के प्रभाव में रोजगार हीन हो जाता है और द्वादशेश के प्रभाव में जातक किसी भयंकर बीमारी से ग्रसित हो जाता है जिससे मानसिक अशांति रहती है। अस्त शनि ग्रह की अंतर्दशा आने पर जातक की सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आती है, उसे अत्यधिक श्रम करना पड़ता है। उसका कार्य व्यवहार नीच प्रकृति के लोगों में रहता है। शनि के अस्त होने पर व्यक्ति के जीवन में कदम-कदम पर संघर्ष होता है. व्यक्ति को रोजगार के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है. व्यक्ति को कभी-कभी घोर दरिद्रता का सामना करना पड़ता है. शनिवार की शाम को पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाये. एक लोहे का छल्ला मध्यमा उंगली में पहने. वृद्ध और अपने से नीचे स्तर के लोगो की सहायता करे.

यदि जातक की कुंडली में कोई भी ग्रह अस्त होने के साथ-साथ अशुभ फलदायी हो तो जातक को उस ग्रह के अशुभ प्रभाव को थोड़ा कम करने हेतु उस ग्रह के ग्रह के यंत्र तथा मंत्र बहुत अच्छे उपाय सिद्द हो सकते हैं जिनके उचित प्रयोग से कुंडली के अशुभ ग्रहों को शांत किया जा सकता है तथा उनसे लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र का निरंतर जप करना चाहिए।

||अस्त ग्रहो को ठीक करने के लिए क्या करना चाहिए??||

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ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव

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