श्राद्ध पक्ष–श्रद्धा का महापर्व

Pitru Paksha 2020 will begin on Tuesday, 1 September and end .. Hindus are bound by their Dharma, or religion, to pray for the souls of their ancestors. It’s a debt they must pay to stay happy. During Pitru Paksha or Shraadh, a 16-lunar-day period in the Hindu calendar which starts this year on September 1, people offer prayers, food and water to their ancestors.

भारतीय महीनों की गणना के अनुसार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सृष्टि पालक भगवान विष्णु के प्रतिरूप श्रीकृष्ण का जन्म धूमधान से मनाया जाता है। तदुपरांत शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को प्रथम देव गणेशजी का जन्मदिन यानी गणेश महोत्सव के बाद भाद्रपद माह की पूर्णिमा से अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का महापर्व शुरू हो जाता है। इसको महापर्व इसलिए बोला जाता है क्योंकि नौदुर्गा महोत्सव नौ दिन का होता है, दशहरा पर्व दस दिन का होता है, पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है।

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। यानी कि 12 महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) 7वें माह अश्विन के प्रथम पांच दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है। सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है।

उपरोक्त ज्योतिषीय पारंपरिक गणना का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी कहा गया है कि आपको सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी यानी बैकबोन (Back Bone) का मजूबत होना बहुत आवश्यक है, जो शरीर के लगभग मध्य भाग में स्थित है और जिसके चलते ही हमारे शरीर को एक पहचान मिलती है। उसी तरह हम सभी जन उन पूर्वजों के अंश हैं अर्थात हमारी जो पहचान है यानी हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत बनी रहे उसके लिए हर वर्ष के मध्य में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करें और हमें सामाजिक और पारिवारिक पहचान देने के लिए श्राद्ध कर्म के रूप में अपना धन्यवाद अर्थात अपनी श्रद्धाजंलि दें।

अपने बुजुर्ग जो इस दुनिया से चले गए हैं, उनके प्रति मन में सद्भावना का होना श्राद्ध कहलाता है। जीतेजी बड़ों की सेवा नहीं की हो, ऐसा लगता हो तो श्राद्ध सफल नहीं होगा। श्राद्ध वाले दिन हमें कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे की ब्राह़मण को खाना क्यों खिलाते है, क्योंकि पंडित जी वर्ग ज्ञान का ज्ञाता है। ज्ञान देने वाला उपकारी होता है, उपकारी का ध्यान रखना हमारा कर्लव्य होता है। श्राद्ध वाले दिन प्रतिज्ञा करे कि अपने बड़ों का कुछ सेवा का कार्य करे, जैसे गौशाला में गाय का ध्यान रखना, अनाथालय का ध्यान रखना, गरीब, असहाय, विधवा, रोगी का ध्यान रखेंगे तो श्राद्ध बनाना सफल हो जाएगा। दूसरी बात अपने बड़ों के उपकारों को याद रखें। उनकी बदौलत हम योग्य बनते है। उपकार जताते रहोगे तो आपके पितृ सही रहेगे। आगे प्रतिज्ञा करे, आज हमारे घर पर श्राद्ध है, अपने बड़ों की इज्जत कर उनके मानसम्मान पर आच नही आने दूंगा तो समझना सच्चा श्राद्ध कर दिया है। अगर जीते जी हमने सेवा नहीं की और उनको सताते रहे, तड़पाते रहे, परेशान करते रहे, कटु वचन बोलते रहे, दुतकारते रहे, वो जाते समय आपसे खुश होकर नही गए। आप स्वयं ही सोचिए कि क्या आपका श्राद्ध लग जाएगा और खुश होकर जाएंगे, श्राद्ध नहीं भी मनाएंगे तो उनका आपके ऊपर आशीर्वाद बना रहेगा। ज्यादातर श्राद्ध डर के कारण करते है कि कहीं हमारे पितृ नाराज ना हो जाएं, इसलिए हमें अपने पितृ के श्राद्ध श्रद्धा से करने चाहिए।

।।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।…ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।

पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारंबार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है।
श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं।

हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ सनातन यज्ञ को संपन्न करने वाले पितरों ने जैसे देहांत होने पर श्रेष्ठ ऐश्वर्य वाले स्वर्ग को प्राप्त किया है वैसे ही यज्ञों में इन ऋचाओं का पाठ करते हुए और समस्त साधनों से यज्ञ करते हुए हम भी उसी ऐश्वर्यवान स्वर्ग को प्राप्त करें।‘- यजुर्वेद

सत्य एवं श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदों में श्राद्ध को पितृयज्ञ कहा गया है। यह श्राद्धतर्पण हमारे पूर्वजों, माता, पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह पितृयज्ञ संपन्न होता है संतानोंत्पत्ति और संतान की सही शिक्षादीक्षा से। इसी से पितृ ऋणभी चुकता होता है।

पितृयज्ञ या श्राद्धकर्म के लिए अश्विन माह का कृष्ण पक्ष ही नियुक्त किया गया है। सूर्य के कन्या राशि में रहते समय आश्विन कृष्ण पक्ष पितर पक्ष कहलाता है। जो इस पक्ष तथा देह त्याग की तिथि पर अपने पितरों का श्राद्ध करता है उस श्राद्ध से पितर तृप्त हो जाते हैं।

कन्या राशि में सूर्य रहने पर भी जब श्राद्ध नहीं होता तो पितर तुला राशि के सूर्य तक पूरे कार्तिक मास में श्राद्ध का इंतजार करते हैं और तब भी हो तो सूर्य देव के वृश्चिक राशि पर आने पर पितर निराश होकर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिंडन, गोष्ठ, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा और पुष्टि।

तर्पण कर्म के प्रकार : पुराणों में तर्पण को छह भागों में विभक्त किया गया है:- 1. देवतर्पण 2. ऋषितर्पण 3. दिव्यमानवतर्पण 4. दिव्यपितृतर्पण 5. यमतर्पण 6. मनुष्यपितृतर्पण।

श्राद्ध पक्ष में व्यसन और मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। पूर्णत: पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। रात्रि में श्राद्धनहीं किया जाता। श्राद्ध का समय दोपहर साढे़ बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना गया है। कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अन्न का अंश निकालते हैं क्योंकि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं।

वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं-(1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ। उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। उक्त पांच यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृयज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।

।।श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छादम्।।
भावार्थ : श्रद्धा से श्रेष्ठ संतान, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।

व्याख्या : वेदों के अनुसार इससे पितृऋण चुकता होता है। पुराणों के अनुसार श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं। संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।

श्राद्ध कर्म : पितरों का परिचय

।।अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥29॥ – गीता

भावार्थ : हे धनंजय! नागों में मैं शेषनाग और जलचरों में वरुण हूं; पितरों में अर्यमा तथा नियमन करने वालों में यमराज हूं।

 पुराणों के अनुसार मुख्यत: पितरों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है – दिव्य पितर और मनुष्य पितर। दिव्य पितर उस जमात का नाम है जो जीवधारियों के कर्मों को देखकर मृत्यु के बाद उसे क्या गति दी जाए, इसका निर्णय करता है।


इस जमात का प्रधान यमराज है। अत: यमराज की गणना भी पितरों में होती है। काव्यवाडनल
, सोम, अर्यमा और यम- यह चार इस जमात के सदस्य हैं। 


इन चारों के अलावा प्रत्येक वर्ग की ओर से सुनवाई करने वाले हैं यथा: अग्निष्व, देवताओं के प्रतिनिधि, सोमसद या सोमपा-साध्यों के प्रतिनिधि तथा बर्हिपद-गन्धर्व, राक्षस, किन्नर सुपर्ण, सर्प तथा यक्षों के प्रतिनिधि हैं।

इन सबसे गठित जो जमात है, वही पितर हैं। यही मृत्यु के बाद न्याय करती है।

दिव्य पितर की जमात के सदस्यगण : 

अग्रिष्वात्त, बर्हिषद आज्यप, सोमेप, रश्मिप, उपदूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक व नान्दीमुख ये नौ दिव्य पितर बताए गए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनी कुमार भी केवल नांदीमुख पितरों को छोड़कर शेष सभी को तृप्त करते हैं।

अर्यमा : 

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की किरण (अर्यमा) र किरण के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। पितरों में श्रेष्ठ है अर्यमा। अर्यमा पितरों के देव हैं। ये महर्षि कश्यप की पत्नी देवमाता अदिति के पुत्र हैं और इंद्रादि देवताओं के भाई। पुराण अनुसार उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है।

इनकी गणना नित्य पितरों में की जाती हैं। जड़चेतनमयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध के समय इनके नाम से जल दान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का हव्यऔर श्राद्ध में स्वधा का कव्यदोनों स्वीकार करते हैं।

सूर्य किरण का नाम अर्यमा : –

देसी महीनों के हिसाब से सूर्य के नाम हैं चैत्र मास में धाता, वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ मेंमित्र, आषाढ़ में वरुण, श्रावण मेंइंद्र, भाद्रपद मेंविवस्वान, आश्विन में पूषा, कार्तिकपर्जन्य, मार्गशीर्ष मेंअंशु, पौष मेंभग, माघ मेंत्वष्टा एवं फाल्गुन में विष्णु। इन नामों का स्मरण करते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।

 

वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं

(1) 
ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।

उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार से दिया गया है। उक्त पांच यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृ यज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।
पूर्वजों के कार्यों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को पितृ दोष कहते हैं।

 

पितृ दोष का अर्थ यह नहीं कि कोई पितृ अतृप्त होकर आपको कष्ट दे रहा है। पितृ दोष का अर्थ वंशानुगत, मानसिक और शारीरिक रोग और शोक भी होते हैं।

घर और बाहर जो वायु है वह सभी पितरों को धूप, दीप और तर्पण देने से शुद्ध और सकारात्मक प्रभाव देने वाली बन जाती है। इस धूप, श्राद्ध और तर्पण से पितृलोक के तृप्त होने से पितृ दोष मिटता है।

पितरों के तृप्त होने से पितर आपके जीवन के दुखों को मिटाने में सहयोग करते हैं। पितृ यज्ञ और पितृ दोष एक वैज्ञानिक धारणा है।

 

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