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प्राचीनकाल से मनाया जाने वाला यह होलिकोत्सव ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्त्व रखता है। भूने हुए अन्न को संस्कृत में ‘होलका’ कहा जाता है। अर्धभुने अनाज को ‘होला’ कहते हैं। होली की आँच पर अर्धभुने अनाज का प्रसाद रूप में वितरण किये जाने की प्राचीन परम्परा से भी सम्भवतः इस उत्सव के ‘होलिकोत्सव’ तथा ‘होली’ नाम पड़े हों। (अर्धभुने धान को खाना वात व कफ के दोषों का शमन करने में सहायक होता है – यह होलिकोत्सव का स्वास्थ्य-हितकारी पहलू है)। प्राचीन परम्परा के अनुसार होलिका-दहन के दूसरे दिन होली की राख (विभूति) में चंदन व पानी मिलाकर ललाट पर तिलक किया जाता है। यह तो सर्वविदित है कि माधुर्य अवतार, प्रेमावतार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को आनंदित-उल्लसित करने के लिए इस महोत्सव का अवलम्बन लिया था।

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