कौन हैं शनिदेव : 2020 में कब है शनि जयंती

कौन हैं शनिदेव

  • शनि जिन्हें कर्मफलदाता माना जाता है। दंडाधिकारी कहा जाता है, न्यायप्रिय माना जाता है। जो अपनीदृष्टि से राजा को भी रंक बना सकते हैं। हिंदू धर्म में शनि देवता भी हैं और नवग्रहों में प्रमुख ग्रह भी जिन्हें ज्योतिषशास्त्र में बहुत अधिक महत्व मिला है। शनिदेव को सूर्य का पुत्र माना जाता है। मान्यता हैकि ज्येष्ठ माह की अमावस्या को ही सूर्यदेव एवं छाया (संवर्णा) की संतान के रूप में शनि का जन्महुआ।

शनिदेव के जन्म से जुडी एक कथा

  • शनिदेव के जन्म से जुडी एक कथा ‘स्कन्द पुराण’ में आयी है जिसके अनुसार सूर्य देव का विवाह राजा दक्ष की कन्या “संज्ञा” के साथ हुआ था।

  • सूर्य देव को “संज्ञा” से तीन पुत्रों का जन्म हुआ। सूर्य देव ने उनका नाम यम, यमुना और मनु रखा।

  • “संज्ञा”सूर्य देव के तेज से परेशान रहती थी वह उनके तेज को अधिक समय तक नहीं सहन कर पायी। इसलिए उसने अपनी प्रतिरूप “छाया” को अपना उत्तरदायित्व देकर सूर्य देव को छोड़ कर चली गई।

  • छाया शिव भक्त थी भक्ति तथा तपस्या में लीन रहती थी परिणाम स्वरूप छाया के गर्भ से उत्पन्न शिशु जिनका नाम शनि रखा गया काले वर्ण के हुए काले वर्ण के कारण पिता सूर्य देव छाया के ऊपर लांछना लगाते हुए बोले की यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता श्री शनिदेव के अन्दर जन्म से माँ कि तपस्या शक्ति का बल था; उन्होंने देखा कि मेरे पिता , माँ का अपमान कर रहे है | उन्होने क्रूर दृष्टि से अपने पिता को देखा, तो पिता के शरीर का रंग काला सा हो गया

  • | घोडों की चाल रुक गयी | रथ आगे नहीं चल सका | सूर्यदेव परेशान होकर शिवजी को पुकारने लगे | शिवजी ने सूर्यदेव कोसलाह दी की आपके द्वारा नारी व पुत्र दोनों का अपमान हुआ है इसलिए यह दोष लगा है |

  • सूर्यदेव ने अपनी गलती स्वीकार किया तथा क्षमा मांगी और पुन: सुन्दररूप एवं घोडों की गति प्राप्त की |

  • तब से श्री शनिदेव पिता के विरोधी, शिवजी के भक्त तथा माता के प्रिय हो गए |

  • इन्हें क्रूर ग्रह माना जाता है जो कि इन्हें पत्नी के शाप के कारण मिली है।
  • शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण है व ये गिद्ध की सवारी करते हैं।
  • फलितज्योतिष के अनुसार शनि को अशुभ माना जाता है व 9 ग्रहों में शनि का स्थान सातवां है। ये एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं तथा मकर और कुंभ राशि केस्वामी माने जाते हैं।
  • शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है।
  • शनि की गुरूत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से 95 वें गुणा ज्यादा मानी जाती है। माना जाता है इसी गुरुत्व बल के कारण हमारे अच्छे और बूरे विचार चुंबकीय शक्ति से शनि के पास पंहुचते हैं जिनका कृत्य अनुसार परिणाम भी जल्द मिलता है।
  • असल में शनिदेव बहुत ही न्यायप्रिय राजा हैं। यदि आप किसी से धोखा-धड़ी नहीं करते, किसी के साथ अन्याय नहीं करते, किसी पर कोई जुल्म अत्याचार नहीं करते, कहने तात्पर्य यदि आप बूरे कामों में संलिप्त नहीं हैं तब आपको शनि से घबराने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि शनिदेव भले जातकों को कोई कष्ट नहीं देते।

2020 में कब है शनि जयंती

  • शनि जयंती पूरे उत्तर भारत में हिंदू पंचांग और  पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाई जाती है।

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  • अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार यह तिथि 22 मई को है।

  • वहीं दक्षिणी भारत के अमावस्यांत पंचांग के अनुसार शनि जयंती वैशाखअमावस्या को मनाई जाती है।

  • संयोगवश उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को शनिजयंती के साथ-साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है।

  • शनि जयंती तिथि – 22 मई 2020

  • अमावस्या  तिथि प्रारम्भ – मई 21, 2020 को सांय 09:35 बजे से

  • अमावस्या तिथि समाप्त – मई 22, 2020 को रात्रि 11:08 बजे तक

शनि जयंती 2020 – क्या है महत्व कैसे और करें शनिदेव की पूजा

  • विशेषकर शनि की साढ़े साती, शनि की ढ़ैय्या आदि शनि दोष से पीड़ित जातकों के लिये इस दिन का महत्व बहुत अधिक माना जाता है।

  • शनिदेव की पूजा करने से सारे शनि के कोप का भाजन बनने से बचाजा सकता है यदि पहले से ही कोई शनि के प्रकोप को झेल रहा है तो उसके लिये भीयह दिन बहुत ही कल्याणकारी हो सकता है

  • शनि राशिचक्र की दसवीं व ग्यारहवी राशि मकर और कुंभ के अधिपति हैं। एक राशि में शनि लगभग 18 महीने तक रहते हैं। शनि का महादशा का काल भी 19 साल का होता है।

  • प्रचलित धारणाओं के अनुसार शनि को क्रूर एवं पाप ग्रहों में गिना जाता है और अशुभफल देने वाला माना जाता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं। क्योंकि शनि न्याय करने वाले देवता हैं औरकर्म के अनुसार फल देने वाले कर्मफलदाता हैं इसलिये वे बूरे कर्म की बूरी सजा देते हैं अच्छे कर्म करनेवालों को अच्छे परिणाम देते हैं।

आइये जानते हैं कैसे करें शनिदेव की पूजा

  • शनिदेव की पूजा विधि – शनिदेव की पूजा भी बाकि देवी-देवताओं की पूजा कीतरह सामान्य ही होती है।

  • प्रात:काल उठकर शौचादि से निवृत होकर स्नानादि सेशुद्ध हों।

  • फिर लकड़ी के एक पाट पर काला वस्त्र बिछाकर उस पर शनिदेव कीप्रतिमा या तस्वीर या फिर एक सुपारी रखकर उसके दोनों और शुद्ध घी व तेल कादीपक जलाकर धूप जलाएं। शनिदेवता के इस प्रतीक स्वरूप को पंचगव्य, पंचामृत,इत्र आदि से स्नान करवायें।

  • इसके बाद अबीर, गुलाल, सिंदूर, कुमकुम व काजललगाकर नीले या काले फूल अर्पित करें। तत्पश्चात इमरती व तेल में तली वस्तुओंका नैवेद्य अपर्ण करें। इसके बाद श्री फल सहित अन्य फल भी अर्पित करें।

  • पंचोपचार पूजन के बाद शनि मंत्र का कम से कम एक माला जप भी करनाचाहिये। माला जपने के पश्चात शनि चालीसा का पाठ करें व तत्पश्चात शनिमहाराज की आरती भी उतारनी चाहिये।

  •  इस पंचोपचार पूजा के बाद इसमंत्र का जप कम से कम एक माला जरूर करना चाहिए ।ॐ प्रां प्रीं प्रौ स: शनये नमः॥अथवाॐ शं शनैश्चराय नमः।मंत्र का जाप करना चाहिए।

  • पश्चात शनि आरती करके उनको साष्टांग नमनकरना चाहिए।

  • शनि देव के पूजा करने के बाद अपने सामर्थ्यानुसार दान देनाचाहिए। इस दिन पूजा-पाठ करके काला कपड़ा, काली उड़द दाल, छाता, जूता, लोहेकी वस्तु का दान तथा गरीब वा निःशक्त लोगो को मनोनुकूल भोजन करानाचाहिए ऐसा करने से शनि देव प्रसन्न होते है तथा आपके सभी कष्टों को दूर कर देते हैं।

  • सामान्यतः हमलोग शनिवार के दिन शनि देव की पूजा करते है। यह पूजाकल्याणप्रद और शनि की कुदृष्टि से हमें बचाती है। शनि जयंती के दिन पूरे विधि-विधान से पूजा करना चाहिए। पूजा में किसी भी प्रकार का प्रमाद नहीं होना चाहिएक्योकि हम सभी जानते है शनि न्याय और मृत्यु के देवता है अतः किसी भी कारणसे हमें कोताही न करने से बचाना चाहिए। बल्कि विशेष ध्यान देना अनिवार्य होताहै। कहा जाता है कि यदि शनि देव क्रोधित हो जाते हैं तो घर की सुख-शांति समाप्तहो जाती है और परेशानी ही परेशानी उतपन्न हो जाता है।

इन बातों का रखें ध्यान शनि देव की पूजा करने के दिन

  •  सूर्योदय से पहले शरीर पर तेल मालिश कर स्नान
    करना चाहिये।

  • शनिमंदिर के साथ-साथ हनुमान जी के दर्शन भी जरूर करने चाहिये।

  • शनि जयंती या शनि पूजा के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।

  • इस दिन यात्रा को भी स्थगित कर देना चाहिये।

  • किसी जरूरतमंद गरीब व्यक्ति को तेल में बने खाद्य पदार्थों का सेवन करवाना
    चाहिये।

  • गाय और कुत्तों को भी तेल में बने पदार्थ खिलाने चाहिये।

  • बुजूर्गों व जरुरतमंद की सेवा और सहायता भी करनी चाहिये।

  • सूर्यदेव की पूजा इस दिन न ही करें तो अच्छा है।

  • शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर को देखते समय उनकी आंखो में नहीं देखना चाहिये।

शनि देव के प्रिय वस्तु

  • शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उनके प्रिय वस्तु का दान या सेवन करनाचाहिए।

  • शनि के प्रिय वास्तु है— तिल, उड़द, मूंगफली का तेल, काली मिर्च, आचार,लौंग, काले नमक आदि का प्रयोग यथा संभव करना चाहिए।

शनि देव को प्रसन्न करने के लिए क्या करना चाहिए

  • अपने मता पिता, विकलांग तथा वृद्ध व्यक्ति की सेवा और आदर-सम्मान करनाचाहिए।

  • हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए।

  • दशरथ कृत शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करे

  • कभी भी भिखारी, निर्बल-दुर्बल या अशक्त व्यक्ति को देखकर मज़ाक या परिहास नहीं करना चाहिए।

  • शनिवार के दिन छाया पात्र (तिल का तेल एक कटोरी में लेकर उसमें अपना मुंहदेखकर शनि मंदिर में रखना ) शनि मंदिर में अर्पण करना चाहिए।

  • तिल के तेल से शनि देव शीघ्र ही प्रसन्न होते है।

  • काली चीजें जैसे काले चने, काले तिल, उड़द की दाल, काले कपड़े आदि का दान सामर्थ्यानुसार नि:स्वार्थ मन से किसी गरीब को करे ऐसा करने से शनिदेव जल्दही प्रसन्न होकर आपका कल्याण करेंगे।

  • पीपल की जड़ में केसर, चंदन, चावल, फूल मिला पवित्र जल अर्पित करें।

  • शनिवार के दिन तिल का तेल का दीप जलाएं और पूजा करें।

  • सूर्योदय से पूर्व शरीर पर तेल मालिश कर स्नान करें।

  • तेल में बनी खाद्य सामग्री का दान गाय, कुत्ता व भिखारी को करें।

  • शमी का पेड़ घर में लगाए तथा जड़ में जल अर्पण करे।

  • मांस मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए

शनि देव की पूजा से लाभ |

  • मानसिक संताप दूर होता है।

  • घर गृहस्थी में शांति बनी रहती है।

  • आर्थिक समृद्धि के रास्ते खुल जाते है।

  • रुका हुआ काम पूरा हो जाता है।स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या धीरे धीरे समाप्त होने लगती है।

  • छात्रों को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलती है।

  • राजनेता मंत्री पद प्राप्त करते है।

  • शारीरिक आलस्यपन दूर होता है।

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