कुंडली में विष-योग होता है अति अनिष्टकारी, जानें कारण व निवारण…

क्या आपके बने-बनाये कार्य बिगड़ रहे हैं ? सावधान विष योग से…………. मृत्युतुल्य कष्ट देता है विष-योग, सही समय पर करें उसका निवारण... कुंडली में अति अनिष्टकारी होता है - विष योग, जानें कारण व निवारण... India Astrology Foundation-ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव (आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं ज्योतिषीय चिंतक)

इंसान का व्यवहार और कार्य, कुंडली के शुभ और अशुभ योगों से प्रभावित होता रहता है। जहाँ शुभ योग, अच्छे फल प्रदान करते हैं वहीँ अशुभ योग पीड़ादायक साबित होते हैं। अगर समय से कुंडली के अशुभ योगों को पहचान लिया जाए और सावधानियां बरती जायें तो पीड़ा को कुछ कम भी किया जा सकता है। ऐसे ही अनिष्टकारी योगों में से एक है विष-योग।

विष दोष – यह दोष शनि-चंद्र के संयोग से निर्मित होता है। चंद्र तीव्र गति वाला ग्रह है, जो प्राणियों के मन व मानसिक स्वास्थ्य का सूचक होता है। इसके विपरीत, शनि सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह है और समस्त पीड़ा व बाधाओं को दर्शाता है। इस दोष से स्मृति क्षमता का हास् होने के साथ ही मानसिक शांति भंग हो जाती है। इस दोष का प्रभाव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दुष्परिणाम के रूप में सामने आता है।

 

किसी भी जातक की कुंडली में विष-योग का निर्माण शनि और चन्द्रमा के कारण बनता है। शनि और चन्द्र की जब युति (दो कारकों का जुड़ा होना) होती है तब विष-योग का निर्माण होता है। कुंडली में विष-योग उत्पन्न होने के कारण लग्न में अगर चन्द्रमा है और चन्द्रमा पर शनि की 3, 7 अथवा 10वें घर से दृष्टि होने पर भी इस योग का निर्माण होता है।

आईये पढ़ते हैं क्या होता है विष योग और इसकी पीड़ा को कैसे कम किया जा सकता है-

कैसे होती है विष योग से हानि

यह योग मृत्यु, भय, दुख, अपमान, रोग, दरिद्रता, दासता, बदनामी, विपत्ति, आलस और कर्ज जैसे अशुभ योग उत्पन्न करता है तथा इस योग से जातक (व्यक्ति) नकारात्मक सोच से घिरने लगता है और उसके बने बनाए कार्य भी काम बिगड़ने लगते हैं।

क्यो आती हैं समस्याएं ?

जन्मकुंडली में इस योग के कारण व्यक्ति का मन दुखी रहता है, परिजनों के निकट होने पर भी उसे अकेलापन महसूस होता है, जीवन में सच्चे प्रेम की कमी रहती है, माता प्यापर चाहकर भी नहीं मिल पाता या अपनी ही कमी के कारण वह ले नहीं पाता है। जातक गहरी निराशा में डूबा रहता है, मन कुंठित रहता है। माता के सुख में कमी के कारण व्यक्ति उदास रहता है।

कुंडली में अगर विष योग बन रहा है तो उसे व्यक्ति को मृत्यु,डर,दुख,अपयश, रोग,गरीबी,आलस और कर्ज झेलना पड़ता है। इस योग से ग्रस्तव व्यक्ति के मन में नकारात्मंक विचार रहते हैं और उसके काम बनते-बनते बिगड़ने लगते हैं

कैसे बनता है कुंडली में विष योग

व्यक्ति की कुण्डली में विष योग का निर्माण ‘शनि और चन्द्रमा’ के कारण बनता है। शनि और चन्द्र की जब युति( दो कारकों का जुड़ा होना) होती है तब विष योग का निर्माण होता है।

लग्न में अगर चन्द्रमा है और चन्द्रमा पर शनि की 3, 7 अथवा 10 वे घर से दृष्टि होने पर भी इस योग का निर्माण होता है।

कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चन्द्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र का हो और दोनों का परिवर्तन योग (alternative yoga) हो या फिर चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों और दोनों की एक दूसरे पर दृष्टि (inter -aspects of Saturn and Moon)हो तब विषयोग की स्थिति बनती है.

यदि कुण्डली में आठवें स्थान पर राहु मौजूद हो और शनि (मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक) लग्न में हो तब भी विष योग की स्थिति बन जाती है। 

कुंडली में कैसे पहचानें विष योग को

यदि आप अपनी कुंडली किसी अच्छे और विद्यवान ज्योतिष को दिखाते हैं तो वह कुंडली का विश्लेषण कर, आपको विष योग बनने के समय को बता सकता है।

यह योग कुंडली के जिस भाव में होता है उसके अनुसार अशुभ फल जातक को मिलते हैं।

 

कुंडली के किस भाव में विष योग का क्या प्रभाव

लग्न स्थान

जिनकी कुण्डली में शनि और चन्द्र की युति प्रथम भाव (combination of Saturn and Moon in the 1st house) में होती है वह व्यक्ति विषयोग (Vishayoga) के प्रभाव से अक्सर बीमार रहता है.व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी परेशानी आती रहती है.ये शंकालु और वहमी प्रकृति के होते हैं. यदि किसी जातक के लग्न स्थान में शनि-चंद्र का विष योग बन रहा हो, तो ऐसा व्यक्ति शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम रहता है। उसे पूरा जीवन तंगहाली में गुजारना पड़ता है। लग्न में शनि-चंद्र होने पर उसका प्रभाव सीधे तौर पर सप्तम भाव पर भी होता है। इससे दांपत्य जीवन दुखपूर्ण हो जाता है। लग्न स्थान शरीर का भी प्रतिनिधित्व करता है इसलिए व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर और रोगों से घिरा रहता है।

द्वितीय भाव

जिस व्यक्ति की कुण्डली में द्वितीय भाव (vish yoga in 2nd house) में यह योग बनता है पैतृक सम्पत्ति से सुख नहीं मिलता है.कुटुम्बजनों के साथ इनके बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.गले के ऊपरी भागों में इन्हें परेशानी होती है.नौकरी एवं कारोबार में रूकावट और बाधाओं का सामना करना होता है. दूसरे भाव में शनि-चंद्र की युति होने पर जातक जीवनभर धन के अभाव से जूझता रहता है।

तृतीया भाव

तीसरे भाव में बना विष योग व्यक्ति का पराक्रम कमजोर कर देता है और वह अपने भाई-बहनों से कष्ट पाता है। इन्हें श्वास सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है.

चतुर्थ भाव

चतुर्थ भाव (4th house)का विषयोग माता के लिए कष्टकारी होता है.अगर यह योग किसी स्त्री की कुण्डली में हो तो स्तन सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है.जहरीले कीड़े मकोड़ों का भय रहता है एवं गृह सुख में कमी आती है. चौथे भाव सुख स्थान में शनि-चंद्र की युति होने पर सुखों में कमी आती है और मातृ सुख नहीं मिल पाता है।

 पंचम भाव

पांचवें भाव में यह दुर्योग होने पर संतान सुख नहीं मिलता और व्यक्ति की विवेकशीलता समाप्त होती है। पंचम भाव (vish yoga in 5th house) में यह संतान के लिए पीड़ादायक होता है.शिक्षा पर भी इस योग का विपरीत असर होता है.

षष्ठ भाव

छठे भाव में विष योग बना हुआ है तो व्यक्ति के अनेक शत्रु होते हैं और जीवनभर कर्ज में डूबा रहता है। षष्टम भाव (6th house)में यह योग मातृ पक्ष से असहयोग का संकेत होता है.चोरी एवं गुप्त शत्रुओं का भय भी इस भाव में रहता है.

सप्तम भाव

सप्तम स्थान कुण्डली में विवाह एवं दाम्पत्य जीवन का घर होता है (7th house is the house of marriage and life partner). इस भाव मे विषयोग दाम्पत्य जीवन में उलझन और परेशानी खड़ा कर देता है.पति पत्नी में से कोई एक अधिकांशत: बीमार रहता है.ससुराल पक्ष से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.साझेदारी में व्यवसाय एवं कारोबार नुकसान देता है.सातवें स्थान में होने पर पति-पत्नी में तलाक होने की नौबत तक आ जाती है।

अष्टम भाव

आठवें भाव में बना विष योग व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट देता है। दुर्घटनाएं बहुत होती हैं। अष्टम भाव में चन्द्र और शनि की युति (combination of Saturn and Moon in 8th house) मृत्यु के समय कष्ट का सकेत माना जाता है.इस भाव में विषयोग होने पर दुर्घटना की संभावना बनी रहती है.

नवम भाव

नवम भाव (9th house) का विषयोग त्वचा सम्बन्धी रोग देता है.यह भाग्य में अवरोधक और कार्यों में असफलता दिलाता है.नौवें भाव में विष योग व्यक्ति को भाग्यहीन बनाता है। ऐसा व्यक्ति नास्तिक होता है।

दशम भाव

दशम भाव (10th house)में यह पिता के पक्ष से अनुकूल नहीं होता.सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद करवाता है.नौकरी में परेशानी और अधिकारियों का भय रहता है. दसवें स्थान में शनि-चंद्र की युति होने पर व्यक्ति के पद-प्रतिष्ठा में कमी आती है। पिता से विवाद रहता है।

एकादश भाव

ग्यारहवें भाव में विष योग व्यक्ति के बार-बार एक्सीडेंट करवाता है। आय के साधन न्यूनतम होते हैं। एकादश भाव (11th house) में अंतिम समय कष्टमय रहता है और संतान से सुख नहीं मिलता है.कामयाबी और सच्चे दोस्त से व्यक्ति वंचित रहता है.

द्वादश भाव

द्वादश भाव (12th house)में यह निराशा, बुरी आदतों का शिकार और विलासी एवं कामी बनाता है.बारहवें भाव में यह योग है तो आय से अधिक खर्च होता है।

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ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव (आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं ज्योतिषीय चिंतक) 7620314972

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