इन 15 में से आप कौन से कर्ज से ग्रस्त हैं, जानिए

व्यक्ति को अपने जीवन में तीन बातें सदैव स्मरण रखनी चाहिएं। वह है-फर्ज (कर्त्तव्य), कर्ज (ऋण) और मर्ज (रोग) जो भी इन बातों को स्मरण रखकर कर्म करता है, वह कभी कष्ट नहीं पाता।

ऋण को कर्ज कहते हैं। परंपरागत ज्योतिष से थोड़ी भिन्न विद्या है लाल किताब। लाल किताब में अधिकतर उपाय अनुभूत सत्य पर आधारित है। प्राचीनकाल में यह विद्या उत्तराखंड और हिमालयीन राज्यों में ही प्रचलित थी। आजकल उसका प्रचलन बढ़ गया है।

आपकी कुंडली के सभी ग्रह अच्छे हैं, लेकिन आपके कर्म खराब हैं तो कुंडली के ग्रह भी खराब होते जाएंगे और तब यह माना जाएगा कि आपके जन्म के समय को कुंडली बनी थीं वह अब पूर्णत: बदल गई है। इसी तरह ग्रहों और आपके कर्मों की चाल के अनुसार कुंडली बदलती रहती है। इस बदलते क्रम में व्यक्ति जन्म काल में जिस ऋण से ग्रस्त नहीं था वह भी उस ऋण से ग्रस्त हो जाता है।

मानव जन्म से पाच प्रकार का ऋणी होता है। देव ऋण, पितृ ऋण, गुरु ऋण, लोक ऋण और भूत ऋण। लेकिन लाल किताब की कुंडली अनुसार 14-15 तरह के ऋण होते हैं जिनमें से किसी एक या दो ऋण से व्यक्ति परेशान रहता है। यज्ञ के द्वारा देव ऋण श्राद्ध और तर्पण के द्वारा पीत्र ऋण, विद्या दान के द्वारा गुरु ऋण, शिव अराधना से भूत ऋण से मुक्ति का साधन, सास्त्रों में बताया गया है। जब तक जीव ऋण मुक्त नहीं होता तब तक पुन: जन्म से छुटकारा नहीं मिल सकता।

प्रमुख रूप से यहां 15 ऋण प्रस्तुत है। इन ऋणों को चुकाने के बाद व्यक्ति जिंदगी भर सुखी रह सकता है। आइये जानते हैं कि वे कौन से ऋण हैं।

1.पितृ ऋण :

कुंडली में बृहस्पति (गुरु) अपने पक्के घर 2, 5, 9, 12 भावों से बाहर हो और बृहस्पति स्वंय 3,6,7,8,10 भाव में स्थित हो और बृहस्पति के पक्के घरों (2,5,9,12) में बुध या शुक्र या शनि या राहु या केतु बैठा हो, तो व्यक्ति पितृ ऋण से पीड़ित होता है। इसके अलावा पांचवें, नौवें या बारहवें भाव में जब शुक्र, बुध या राहु या फिर इनकी युति हो, तो जातक पर पितृ-ऋण ग्रस्त माना जाता है।


कारण : पितृ ऋण के कई कारण है। प्रारब्ध के कारण भी पितृ ऋण होता है। इसके अलावा तात्कालिक भी पितृ ऋष या दोष पैदा हो जाता है जैसे कि यदि आपने पास के मंदिर में तोड़ फोड़ हो, बढ़, पीपल, नीम, तुलसी सहित सात प्रमुख वृक्षों को काटा या कटवाया हो या पिता, दादा, नाना, कुल पुरोहित, पंडित आदि का अपमान किया हो।


पितृ ऋण के लक्षण –समय से पहले बाल सफेद, सुख-समृद्धि समाप्त, बनते कार्यों में विलम्ब हो तो जातक पितृ ऋण से ग्रसित होता है।


समाधान :

इस ऋण को कुछ लोग पितृदोष भी कहते हैं। इस दोष में सूर्य का उपाय करना चाहिए। इसके अलावा यह उपाय घर के सभी सदस्यों को मिलकर ही करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों से बराबर धन एकत्रित करके किसी मंदिर में दान कर दें। किसी पीपल के वृक्ष को लगातार 43 दिन तक पानी अर्पित करें।

2.मातृ ऋण :

जब कुंडली में चन्द्रमा द्वितीय एवं चतुर्थ भाव से बाहर कहीं भी स्थित हो तथा चतुर्थ भाव में केतु हो तो व्यक्ति मातृ-ऋण से पीड़ित रहता है। अर्थात चन्द्रमा विशेषतः 3,6,8,10,11,12 भावों में स्थित हो तो। इसके अलावा जब केतु कुंडली के चौथे भाव में बैठा हो तब भी मातृ ऋण माना जाता है।


कारण : जातक के कुल में किसी बड़े या पूर्वज ने विवाह या बच्चा होने के बाद अपनी मां को छोड़ दिया हो, नजरअन्दाज किया हो, मां के दुखी और उदास होने पर उसकी परवाह न की हो या मां को किसी भी रूप में दुखी किया हो। यह भी संकेत हो सकता है कि पास के कुंए या नदी की पूजा करने के बजाय उसमें गंदगी और कचरा डाला जा रहा होगा।


मातृ ऋण के लक्षण – घर की सम्पत्ति का नष्ट होना, पशुओं की मृत्यु, शिक्षा में बाधा, घर में अनेक प्रकार के रोग होना, अगर कोई व्यक्ति सहायता करने का प्रयत्न करता है, तो वह भी संकटों से घिर जाता है और प्रत्येक कार्य में असफलता का सामना करना पड़ता है।


समाधान : इस में सर्वप्रथम मां की सेवा करना चाहिए। चंद्र का उपाय करना चाहिए। बहते पानी या नदी में एक चांदी का सिक्का बहाना चाहिए। माता दुर्गा से क्षमा मांगनी चाहिए।इसके अलाव अपने सभी रक्त (सगे) संबंधियों से बराबर-बराबर मात्रा में चांदी लेकर किसी नदी में बहाएं। यह काम एक ही दिन करना है।

3.स्त्री ऋण :

जब शुक्र कुंडली के 3,4,5,6,9,10,11 भावों में स्थित हो तथा द्वितीय या सप्तम भाव में सूर्य, चन्द्र या राहु स्थित हो तो जातक स्त्री (पत्नी) के ऋण से ग्रस्त होता है। इसके अलावा सूर्य, चन्द्र या राहु या उनकी युति कुंडली के दूसरे अथवा सातवें भाव में हो, तो जातक स्त्री-ऋण से ग्रसित माना जाता है।


कारण : इसका कारण पूर्वजों द्वारा लोभ या विवाहेतर संबंधों के चलते पत्नी या परिवार की किसी स्त्री की हत्या की संभावना या किसी गर्भवती महिला को हानि पहुंचाना हो सकता है।

इसका संकेत यह माना जा सकता है कि घर में ऐसे जानवर होंगे जो समूह में न रहते हों। पत्नी का मन दुखाने और उसका अपमान करने से यह ऋण निर्मित होता है जो व्यक्ति की बर्बादी का कारण भी बन जाता है।


समाधान : स्त्री या पत्नीं का सस्मान करना और उन्हें खुश रखना सीखें। रक्त संबंधियों से बराबर मात्रा में पैसे लेकर उसका चारा खरीदें और दिन के किसी समय पर 100 गायों को एक ही दिन में हरा चारा खिलाएं। चरित्र को उत्तम बनाए रखें और माता लक्ष्मी की पूजा करें। पांच शुक्रवार को व्रत उपवास रखें।

 

4.पुत्री-बहन का ऋण :

जब कुंडली में बुध 1,4,5,8,9,10,11 भावों में स्थित हो तथा 3,6 भावों में चन्द्रमा या बुध हो तो व्यक्ति पुत्री और बहन के ऋण से ग्रस्त होता है। यह ऋण है तो नौकरी और व्यापार में व्यक्ति कभी तरक्की नहीं कर सकता और वह हमेशा चिंता से ही घिरा रहता है।

कारण : इसका कारण किसी की बहन या बेटी की हत्या या उन्हें परेशान करने की संभावना हो सकती है या फिर किसी अविवाहित स्त्री या बहन के साथ विश्वासघात किया हो।


इसका संकेते यह हो सकता है कि खोए हुए बच्चों को बेचना या उससे लाभ कमाने का प्रयास किया गया हो।


समाधान : बहन को खुश रखने के उपाय पर विचार करें। बहन नहीं है तो बहन बनाएं और उसको हर तरह से सम्मानित करें। सारे परिजन पीले रंग की कौड़ियाँ लेकर एक जगह इकट्ठी करके जलाकर राख कर दें और उस राख को उसी दिन नदी में विसर्जित कर दें।

5.भाई का ऋण :

लाल किताब के अनुसार जब बुध या शुक्र किसी कुंडली के पहले या आठवें भाव में स्थित हों, तो उस जातक को भ्रातृ-ऋण या संबंधी-ऋण का भागी माना जाता है। इसे इस तरह समझें- कुंडली में मंगल 2,4,5,6,9,11 एवं 12 भावों में स्थित हो तथा प्रथम व अष्टम भाव में बुध, केतु स्थित हो, तो व्यक्ति रिश्तेदारी के ऋण से ग्रस्त होता है।

कारण: किसी पूर्वज द्वारा किसी दोस्त या रिश्तेदार के खेत या घर में आग लगाना या फिर भाई या संबंधी के प्रति द्वेष का भाव हो सकता है। दूसरा कारण घर में बच्चे के जन्म या उत्सव विशेष के वक्त घर से दूर रहना भी हो सकता है।

समाधान : भाई और रिश्तेदारों से संबंध अच्‍छे बनाएं। सभी परिजनों से रकम इकट्ठी करके किसी हकीम या वैद्य को दान करें।

6.आत्म-ऋण :

 पांचवें भाव में जब शुक्र, शनि, राहु या केतु स्थित हों या इनमें से किसी की युति पंचम भाव में हो, तो जातक आत्म-ऋण का भागी माना जाता है।

कारण : इसका कारण पूर्वजों द्वारा परिवार के रीति-रिवाजों और परम्पराओं से अलग होना या परमात्मा में अविश्वास हो सकता है।

इसका संकेत यह है कि घर के नीचे आग की भट्ठियां होंगी या छ्त में सूर्य की रोशनी आने के लिए बहुत सारे छेद होंगे।

समाधान : सभी संबंधियों के सहयोग से सूर्य यज्ञ का आयोजन करना चाहिए।

7.क्रूरता-ऋण :

 सूर्य, चन्द्रमा या मंगल या इनमें से किसी की युति कुंडली के दसवें या बारहवें भाव में हो, तो जातक को इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।

कारण: इसका कारण किसी की जमीन या पुश्तैनी घर जबरन हड़पना या फिर मकान-मालिक को उसके मकान या भूमि का पैसा न देना हो सकता है।

समाधान: अलग-अलग जगह के सौ मजदूरों या मछलियों को सभी परिजन धन इकट्ठा करके एक दिन में भोजन कराएं।

8.अजात-ऋण या पैदा ही न हुए का ऋण :

लाल किताब के मुताबिक जब सूर्य, शुक्र या मंगल या फिर इन ग्रहों की युति कुंडली के बारहवें भाव में हो, तो जातक इस ऋण का भागी कहलाता है।

कारण : इसका कारण ससुराल-पक्ष के लोगों के साथ छल या फिर किसी को धोखा देने पर उसके पूरे परिवार का बर्बाद हो जाना है।

 

समाधान : सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें। ससुराल पक्ष से संबंध अच्छे बनाए रखने से यह ऋण नहीं होता।

9.कुदरती ऋण :

जब चन्द्रमा या मंगल कुंडली के छठे भाव में स्थित हों, तो जातक इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।

कारण : इसका कारण किसी कुत्ते को मारना या भतीजे से इतना कपट करना कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए।

समाधाना : एक ही दिन में सौ कुत्तों को एक दिन में सभी परिजनों के सहयोग से दूध या खीर खिलानी चाहिए। ऐसा नहीं कर पाने की स्थिति में किसी विधवा की सेवा करके उससे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। भैरव महाराज से क्षमा मांगना चाहिए।

10.जाति ऋण :

जब कुंडली में 1,5,11 भावों को छोड़कर सूर्य कहीं भी स्थित हो तथा पंचम भाव में शुक्र, शनि, राहु या केतु स्थित हो, तो व्यक्ति जाति के ऋण से पीड़ित होता है।

इसका कोई भी स्पष्ट कारण या समाधान नही है।

 

11.जालिमाना ऋण:

जब कुंडली में शनि 1,2,5,6,8,9,12 भावों में स्थिति हो तथा 10 या 11 भावों में सूर्य, चन्द्र और मंगल स्थित हो तो व्यक्ति जालिमाना ऋण से पीड़ित होता है।


कारण:आपके पूर्वजों या पितरों ने किसी से धोखा किया या उसे घर से बाहर निकाल दिया या उसे गुजारा नहीं दिया होगा। घर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में होगा अथवा घर की जमीन किसी ऐसे व्यक्ति से ली गई होगी जिसके पुत्र न हो या घर किसी सड़क या कुएं के ऊपर निर्मित होगा।

समाधान:अलग-अलग जगह की सौ मछलियों को सभी परिजन धन इकट्ठा करके एक दिन में भोजन कराएं। इसका विकल्प यह है कि अलग अलग जगह के 10 मजदूरों को भोजन कराएं।

12.अजन्मे का ऋण

जब कुंडली में राहु 6,12,3 भावों के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो या 12वें भाव में सूर्य, मंगल और शुक्र मौजूद हो या दोनों ही प्रकार की स्थिति हो, तो व्यक्ति अजन्मे के ऋण से ग्रस्त होता है।

कारण : आपके पूर्वजों ने ससुराल-पक्ष के लोगों को धोखा दिया या किसी रिश्तेदार के परिवार के विनाश में भूमिका निभाई होगी। संकेत यह भी हो सकता है कि दरवाजे के नीचे कोई गंदा नाला बह रहा होगा या कोई विनाशित श्मशान होगा अथवा घर की दक्षिणी दीवार से जुडी कोई भट्ठी होगी।

समाधान : सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें।

आध्यात्मिक ऋण : जब कुंडली में केतु 2,6,9 के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो तथा छटे भाव में चन्द्रमा और मंगल स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति पर आध्यात्मिक ऋण होता है।

13.संबंधी ऋण :

लाल किताब के अनुसार जब बुध और केतु कुंडली के पहले अथवा आठवें भाव में हो, तो संबंधी ऋण से ग्रसित माना जाता है।

कारण: हो सकता है कि आपके पूर्वजों ने किसी की फसल या घर में आग लगाई हो, किसी को जहर दिया हो अथवा किसी की गर्भवती भैंस को मार डाला हो। इसका संकेत यह भी हो सकता है कि घर में किसी बच्चे के जन्मदिन, त्योहारों या अन्य उत्सवों के समय अपने परिवार से दूर रहना अथवा रिश्तेदारों से न मिलना।

समाधान : अपने सभी रक्त संबंधियों से बराबर मात्रा में पैसे लेकर उसे दूसरों की मदद के लिए किसी चिकित्सक को दें या उससे दवाएं खरीद कर धर्मार्थ संस्थाओं को दें।

14.आध्यात्मिक ऋण

जब कुंडली में केतु 2,6,9 के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो तथा छटे भाव में चन्द्रमा और मंगल स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति पर आध्यात्मिक ऋण होता है।


कारण : स्पष्ट नहीं।


समाधान :स्पष्ट नहीं।

15.ब्रह्मा ऋण

पितृ ऋण या दोष के अलावा एक ब्रह्मा दोष भी होता है। इसे भी पितृ के अंर्तगत ही माना जा सकता है। ब्रम्हा ऋण वो ऋण है जिसे हम पर ब्रम्हा का कर्ज कहते हैं। ब्रम्हाजी और उनके पुत्रों ने हमें बनाया तो किसी भी प्रकार के भेदवाव, छुआछूत, जाति आदि में विभाजित करके नहीं बनाया लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद हमने ब्रह्मा के कुल को जातियों में बांट दिया। अपने ही भाइयों से अलग होकर उन्हें विभाजित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ की हमें युद्ध, हिंसा और अशांति को भोगना पड़ा और पड़ रहा है।

धर्मान्तरण के होंगे बुरे परिणाम

वर्तमान में लालच, डर या सैंकड़ों सालों से फैलाई गई नफरत के आधार पर कुछ लोग अपना पितृ धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेते हैं। इसका परिणाम वर्तमान में नहीं लेकिन बाद में भुगतना ही होगा। हालांकि देश के बहुत से क्षेत्र भुगत भी रहे हैं। धर्मान्तरण जैसे कृत्यों से ब्रह्मा का दोष उत्पन्न होता है और फिर आपके बच्चों को इसका भुगतान करना होगा।

ब्रह्मा दोष हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, कुल देवता, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है।

बहुत से लोग अपने पितृ धर्म, मातृभूमि या कुल को छोड़कर चले गए हैं। उनके पीछे यह दोष कई जन्मों तक पीछा करता रहता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म और कुल को छोड़कर गया है तो उसके कुल के अंत होने तक यह चलता रहता है, क्यों‍कि यह ऋण ब्रह्मा और उनके पुत्रों से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार ऐसे व्यक्ति का परिवार किसी न किसी दुख से हमेशा पीड़ित बना रहता है और अंत: मरने के बाद उसे प्रेत योनि मिलती है।

मनुष्य जन्म लेता है तो कर्मानुसार उसकी मृत्यु तक कई तरह के ऋण, पाप और पुण्य उसका पीछा करते रहते हैं। हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि तीन तरह के ऋण को चुकता कर देने से मनुष्य को बहुत से पाप और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि जो लोग इसमें विश्वास नहीं करते उनको भी जीवन के किसी मोड़ पर इसका भुगतान करना ही होगा।

मनुष्य जन्म लेता है तो कर्मानुसार उसकी मृत्यु तक कई तरह के ऋण, पाप और पुण्य उसका पीछा करते रहते हैं। हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि तीन तरह के ऋण को चुकता कर देने से मनुष्य को बहुत से पाप और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि जो लोग इसमें विश्वास नहीं करते उनको भी जीवन के किसी मोड़ पर इसका भुगतान करना ही होगा। आखिर ये तीन ऋण कौन से हैं और कैसे उतरेंगे यह जानना जरूरी है।

ये तीन ऋण हैं:- 1.देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण।

इन तीन ऋणों को उतारना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। यह जीवन और अगला जीवन सुधारना हो, तो इन ऋणों के महत्व को समझना जरूरी है। मनुष्य पशुओं से इसलिए अलग है, क्योंकि उसके पास नैतिकता, धर्म और विज्ञान की समझ है। जो व्यक्ति इनको नहीं मानता वह पशुवत है।

क्यों चुकता करना होता है यह ऋण?

तीन ऋण नहीं चुकता करने पर उत्पन्न होते हैं त्रिविध ताप अर्थात सांसारिक दुख, देवी दुख और कर्म के दुख। ऋणों को चुकता नहीं करने से उक्त प्रकार के दुख तो उत्पन्न होते ही हैं और इससे व्यक्ति के जीवन में पिता, पत्नी या पुत्र में से कोई एक सुख ही मिलता है या तीनों से वह वंचित रह जाता है। यदि व्यक्ति बहुत ज्यादा इन ऋणों से ग्रस्त है तो उसे पागलखाने, जेलखाने या दवाखाने में ही जीवन गुजारना होता है।

त्रिविध ताप क्या है?

*सांसारिक दुख अर्थात आपको कोई भी जीव, प्रकृति, मनुष्य या शारीरिक-मानसिक रोग कष्ट देगा।

*देवी दुख अर्थात आपको ऊपरी शक्तियों द्वारा कष्ट मिलेगा।

*कर्म का दुख अर्थात आपके पिछले जन्म के कर्म और इस जन्म के बुरे कर्म मिलकर आपका दुर्भाग्य बढ़ाएंगे।

इन सभी से मुक्ति के लिए ही ऋण का चुकता करना जरूरी है। ऋण का चुकता करने की शुरुआत ही संकटों से मुक्त होने की शुरुआत मानी गई है।

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