ठगी का प्रयोग – काल सर्पयोग

1) मनुष्य शारिरिक रूप से बीमार रहने लगता है। 2) मनुष्य का व्यवसाय बनता बिगडता रहता है। 3) मनुष्य के कार्य में भारी रूकावटे आने लगती है। 4) आत्मा अशांत रहती है। मनुष्य काल का ग्रास बन जाता है।
अब आप ध्यान दे कि राहु-केतु के मध्य ग्रहों का आना यह मेदनिय ज्योतिष का एक विशेष योग है जो कि राष्ट्र भविष्य के हेतु बनाया गया विचारणीय योग है। इसका फल नृपनाश और धनधान्य नाश बताया गया है। इसके बारे में बिन्दु निम्न है। ये बिन्दु भी उपरोक्त पुस्तकों में ही बताये गये है। ध्यान दें।

काल सर्पयोग,
लेकिन इन शब्दों का वास्तविक अर्थ कुछ और है जो सामान्य जनमानस को ठगने के कारण पाखण्डी ज्योतिषी ज्ञात नहीं कराते है।
भारतीय ज्योतिष मनुष्य जन्म में पैदा होने वाली समस्याओं और परेशानियों का सार्थक एवं वैज्ञानिक हल ढूंढने में सक्षम रहा है।

जो लोग कर्म पर विश्वास न करके भाग्य को चमकाने के लिए पंडित जी के पास चमत्कार की उम्मीद लेकर जाते है, वो लोग ही ठगे जाते है।
India Astrology Foundation-ज्योतिर्विद श्यामा गुरुदेव (आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं ज्योतिषीय चिंतक)

ज्योतिष एक विज्ञान है, जो हमारे जीवन के लिए एक अच्छे मार्गदर्शक का कार्य बेहतर ढंग से कर सकता है। खैर हम अपने विषय पर आते है आज हम चर्चा करेंगे क्या सच में कालसर्प योग होता है या फिर इसे बेवजह लोगों को डराने के लिए इस योग को रचित किया गया है।

आज का वर्तमान युग आपसी स्पर्धा, महत्वकांक्षा और भागदौड तथा अव्यवस्थीत दिनचर्या का युग है। इस समय हार-जीत, रहन-सहन, आचार-विचार आदि के पैमाने बदल रहे हैं। आपके जिवन मे भी जरूरी है कि आपको इन सब का आपको लाभ मिले।

आज के समय में अगर किसी को कोई इच्छित वैभव या वस्तु नहीं मिलती तो व्यक्ति का ध्यान अपने भाग्य पर जरूर जाता है और वो यह सोचता है कि शायद यह वस्तु, पद, प्रतिष्ठा, मेरे हिस्से में है या नही इसी शंका को मन में रखकर वो एक ज्योतीष के पास जाता है, ज्योतीषीजी महाराज तैयार बैठे हैं।                                             

आपके जाते ही कह देंगे कि आपकी पत्रिका में कालसर्प योग विद्यमान है और उसकी शांती करवाइये। वर्तमान समय में कालसर्प योग का विवेचन ज्यादा करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस समय ज्योतिष से सम्बन्धित जितनी भी मासिक पत्राीकाए और पाॅकेट बुक्स वाले, टी.वी. चैनल्स वाले, समाचार पत्रों आदि में इसके बारे में खूब लिखा गया है, और तरह-तरह के शांती विद्यान भी बताये गयें हैं, परन्तु अगर इस योग की सच्चाई पर हम ध्यान दें तो यह सिद्ध होता है कि यह योग सरासर झुठा और कपोल कल्पित है।

 

जैसे कि सर्व-विदित है कि नवग्रहों में दो अप्रधान—छायाग्रह—राहु-केतु , जो वस्तुतः एक ही ग्रह के शीर्ष और कबन्ध खण्ड हैं, के सम्यक् प्रभाव-क्षेत्र में जन्मकालिक सभी (शेष सात सूर्यादि) ग्रहों के आ जाने से जो योग बनता है, उसे ही आधुनिक ज्योतिष में कालसर्पयोग नाम से प्रचारित किया जा रहा है ।

जी हां, आधुनिक ज्योतिषीय पुस्तकों में, न कि प्राचीन ज्योतिषीय ग्रन्थों में । आधुनिकता और प्राचीनता का काल निर्धारण अपने आप में किंचित विवाद का विषय है । वैदिक-पौराणिक काल के प्राचीन ग्रन्थ में सीधे इस नाम के योग का न पाया जाना ही इसे संशय के घेरे में ला खड़ा किया है ।

परिणामतः पक्ष-विपक्ष के विचारों की अनुगूंज स्वाभाविक है । वर्तमान में स्थापित ज्योतिषियों का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो इसे परले सिरे से नकारता है और सीधे ठगी का स्रोत करार दे देता है, तो ठीक इसके विपरीत बहुसंख्यक आधुनिक ज्योतिषी ऐसे भी हैं, जो इसके बड़े जोरदार  समर्थक हैं ।

 

 क्योंकी इस योग का वर्णन हमारे प्राचीन आचार्यो ने कहीं पर भी नहीं किया है। वृहदपाराशरी, वृहद जातक आदि ग्रन्थों में राजयोग, अरिष्ट योग, व्यत्यय योग, नमसंयोग, अनफा, सुन्फा, दुर्धरायोग आदि के बारे में शताधिक पृष्ठ भरें पडे है। सुना है कि यवनचार्य ने 1800 प्रकार के नामस योग का वर्णन भी किया है। नामस योगों मे से दो दलयोग भी कहे गये है वृहदजातक की केदारदत्त टीका में लिखा कि सभी पापी या शुभ गृह केन्द्र भावों मे विद्यमान हो जावे तो सर्प और माला नाम वाले दो अशुभ योगो का निर्माण कर देते है।

जातक-पारिजातक में मालायोग को सकूयोग भी कहा गया है जो माला का ही पर्याय होता है। “ज्योतिष तत्व” में सर्पयोग को ज्वालायोग भी कहा गया है।

 

कल्याण वर्मा ने अपने ज्योतिषीय ग्रन्थ “सारावली” में दल योगों का फल निम्न बताया है कि दल योग में जन्मा जातक जीवन भर दुःख सुख भोगता ही रहता है।

“जातक पारिजातक” के माला और सर्पयोग दोनो में “काल” शब्द जोडकर “कालसर्प” नामक एक नया योग हमारे आधुनिक ज्योतिर्विदो ने बनाया है। पाराशर, जैमिनी, केशव, वराह, श्रीपती आदि ने भी इस योग का वर्णन कहीं पर भी नहीं किया है।

यह तो सर्वविदित है कि राहु व केतु कोई ग्रह नहीं बल्कि छाया ग्रह है और पृथ्वी एंव चन्द्र की परिक्रमा के कटान बिन्दु है जिसकी चाल तीन कला ग्यारह विकला प्रतिदिन है।

यह योग किसी न किसी आधुनिक ढंग के व्यक्ति के द्वारा रचा गया प्रतीत होता है। क्योंकी इस शब्द का प्रथम रचियता कौन है। इसकी जानकारी किसी भी ग्रन्थ या पुस्तक में विद्यमान नहीं है। केवल मीडिया के लोग ही ठगों द्वारा ठगे जाने पर कमाई का कुछ हिस्सा लेकर यह प्रचार कर रहे है। अब जरा इस योग के मानने वालों लोगो के प्रचार कर रहें है। अब जरा इस योग के मानने वाले लोगों के विचारो को लेकर भी चर्चा करें तो ज्यादा ठीक रहेगा। इस योग के ज्यादातर प्रकाशन तो एक दुसरे की सत्यप्रत ही है। उदाहरणतः वाक्य यह है कि – (महर्षि पराशर एवं वराह मिहिर जैसे प्राचीन ज्योतिषचार्य ने ‘कालसर्प‘ योग को माना है। अपनो ग्रन्थों में जिक्र किया है। महर्षि भृगु, कल्याण वर्मा, बादरायण, गर्भ, आदि ने भी ‘कालसर्प‘ योग सिद्ध किया है । इसके अलावा 1 पृष्ठ पूरा का पूरा चतुराई से ज्यों का त्यों लिखा गया है और भी पृष्ठों मे समानता ज्यों की त्यों नजर आती है। एक लेखक ने पहले पृष्ठ पर अपना अनुभव बीस हजार कुण्डलियों पर बताकर दुसरे ही पृष्ठ में उस अनुभव को बाईस हजार कुण्डलियों पर बताया है। अब आप ही विचार करें कि सत्य क्या है। इन दोनो ने कहा है कि प्राचीन आचार्यो ने इस योग को स्वीकार किया है। पर यह नहीं बता पाये की स्वीकार कहाँ पर किया है। दोनों पुस्तको के नाम व लेखक निम्न है। पुस्तक नं. 1 ‘कालसर्प‘ योग एवं ‘शनि विधान‘ लेखक – पं. भवानी खण्डेलवाल प्रकाशक – श्री सरस्वती प्रकाशन, अजमेर, पुस्तक नं. 2 कालसर्प योग (निवारण और अनुष्ठान) लेखक – पं. केवल आनन्द जोशी, प्रकाशक – राजा पाॅकेट बुक्स, दिल्ली है। अब इस योग के मानने वाले लोगों के विचारो की रूपरेखा का …… अध्ययन करते है। वे कहते हैं कि यह योग राहु – केतु के बीच में सारे ग्रह आ जाने से बनते है। अब आप इस विचार को जरा सैद्धान्तिक रूप से देखें कि सभी ग्रह अपनी – अपनी कक्षाओं में घुमते रहते है। कोई भी ग्रह अपनी कक्षा मे परिवर्तन नहीं करता है। तो सारे ग्रह राहु केतु के बीच में कैसे आ सकते हैं। जबकी यह दोनो ग्रह नही है। दुसरी बात कि उन का कहना है कि यह योग बडा कष्टकारी है, तो जो नहीं है। वह कष्टकारी कैसे हो सकता है।

ज्योतिष में योगो की रचना 2 प्रकार से होती है।

1)  ग्रहों के पारस्परिक युति व दृष्टी संबंध से बने योग

2)  ग्रहो की सापेेक्ष स्थिती द्वारा बने योग-

गजकेशरी, बुधादित्य, सुनफा आदि यह दोनो इन दोनों श्रेणीयों मे नही आता है। क्योंकी यह दृष्टी या युति से बनने वाला योग न होकर इन के बीच में सारे ग्रहों के आने से बनने वाला योग है।

जबकि पाप या शुभ कर्तरी 1 भाव या भावस्थीत ग्रहों की ही होती है। 7 ग्रहो और 7 भावों की नहीं क्योंकी प्राचीन ग्रन्थो में कर्तरी योग केवल 1 ही भाव या भावस्थ ग्रहों पर माना गया है सर्वत्रा नहीं।

इस प्रकार यह योग भी शास्त्रा सम्मत सिद्ध नहीं होता है। एक और भी ध्यान दें कि योग का फल योग कर्ता के बलाबल (षड्ावल) के आधार पर दिया जाता है। जबकि राहु-केतु का षड्बल नही निकाला जाता है। और इसकी स्वयं की राशी उच्च-नीच-मूल त्रिकोण के बारे में भी सभी आचार्य एक मत नहीं तो फल कैसा

! ऐसे में इनके बारे में इसका फल इसके स्थित भाव, राशि, ग्रह सम्बध पर आधारित नहीं है। यानि कि जिस भाव में स्थित होंगे उसी के अनुसार अपना फल देंगे।

एक टिकाकार कहते है कि यह ग्रह जिस भाव में स्थित होंगे उसी का फल देंगे यानि कि उस भाव के स्वामी का स्वामीत्व प्रायः जाता रहता है। इसलिए जब यह केन्द्रस्थ होते है, तो केन्द्रेश हो जाते है। त्रिकोणस्थ होते है तो त्रिकोणेश हो जाते हंै। इसलिए जब ये केन्द्र में बैठकर त्रिकोणेश से सम्बध करें तो राजयोग कारक और केन्द्र में बैठकर केन्द्रेश से सम्बध करें तो न्यून भाग्यकारक हो जाते हैं।

इस कि दृष्टी भी किसी भी स्थान पर विचारणीय नहीं है। क्योंकी किसी भी ग्रंथकार ने इनकी कोई भी दृष्टी नही मानी है। किसी भी ग्रन्थकार ने राहु-केतु को नामस योग में शामील नहीं किया है।

अब आप ध्यान दे कि राहु-केतु के मध्य ग्रहों का आना यह मेदनिय ज्योतिष का एक विशेष योग है जो कि राष्ट्र भविष्य के हेतु बनाया गया विचारणीय योग है। इसका फल नृपनाश और धनधान्य नाश बताया गया है।

इसके बारे में बिन्दु निम्न है। ये बिन्दु भी उपरोक्त पुस्तकों में ही बताये गये है। ध्यान दें।

1)  मनुष्य शारिरिक रूप से बीमार रहने लगता है।

2)  मनुष्य का व्यवसाय बनता बिगडता रहता है।

3)  मनुष्य के कार्य में भारी रूकावटे आने लगती है।

4)  आत्मा अशांत रहती है। मनुष्य काल का ग्रास बन जाता है।

इसके अलावा भी न जाने क्या-क्या समस्याएं बताई है जो एक लेख मे लिखना संभव नही,

अब इसके शांति विधान भी इन्हों ने बताये हैं कि आप विचार करें कि अगर ये योग ही शास्त्रा सम्मत नहीं है तो शास्त्रा सम्मत शांति और मुहूर्त क्या होता है।

कोई भी पंचागकार अपने पंचाग में इन शांति विधानो का मुहूर्त नहीं लिखता है। तो फिर विशेष मुहूर्त क्या हुआ।

क्या ब्रह्माजी ने सारे अभिशप्त लोगो को इसी समय पैदा करने की योजना बनाई है ?

आप ध्यान दें कि जब कभी गोचर वश राहु-केतु के मध्य सारे ग्रह आते है। और इन महिनो मे 15 दिन चन्द्रमा भी उनके मध्य आता है। इस योग को मानने वाले इसे पुर्ण काल सर्प योग व 15 दिन चन्द्रमा जब इन दोनो से बाहर रहता है तो इसे वे अर्धकालसर्पयोग मानते है। अगर इस बात को माने भी तो क्या ब्रह्माजी ने सारे अभिशप्त लोगो को इसी समय पैदा करने की योजना बनाई है। नही यह नही हो सकता है। क्योकि जब दो जुड़वा बच्चो का जन्म एक साथ होने पर भी उनका व्यक्त्वि, आचार, विचार, व्यवहार, आदतें आपस मे नही मिलती है तो क्या इस गोचर के समय पैदा हुए कुछ व्यक्तीयो का जीवन एक जैसा होगा ? नही ये कदापि संभव नही है।

अगर आप के विचारो को और ज्यादा स्पष्ट करे तो यह भी ध्यान दिजिए कि आज तक इस योग पर कोई भी प्रामाणिक शोध हुआ ही नही है। बाजार मे जितनी भी मासिक पत्रिकाएं और पाॅकेट बुक्सवालो के द्वारा जिन-जिन लेखको ने इस योग का बताया वे मात्रा लेखक या संग्रहकर्ता ही होते है, शोधकर्ता नहीं।

आप भी इन लेखको के भयानक वाक्यो से बचे रहे तो ज्यादा ठीक रहेगा। क्योकि अगर आपके जिवन में कोई समस्या है तो, आप इनसें सम्पर्क करनेे के बजाय आप किसी अच्छे ज्योतिषी से संपर्क करे तो वो आप को स्पष्ट बतायेगा कि आप की समस्या ‘कालसर्पयोग‘ की देन नही है। यह समस्या इस योग का पूर्वजन्म के इस णिं से पैदा हुई है और इसका समाधान यह होगा। आप विश्वास रखें कि श्रद्धा से किया गया जप-तप,यज्ञ, दान, व्रत-उद्यापन, वैदिक पूजा अनुष्ठान आपको आपकी समस्या से अवश्य मुक्त करेगा। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है और आपका भी हो जायेगाा।

कालसर्प योग की भयानक संज्ञा

राहु-केतु के मध्य में सभी सातों ग्रहों की स्थिति को ही कालसर्प योग की भयानक संज्ञा दी गई है। काल शब्द जोड़ने मात्र से ही जातक के मन में मृत्यु का भय समा जाता है और यदि काल के साथ सर्प जोड़ दिया जाये तो भय और भयानक हो जाता है। लेकिन इन शब्दों का वास्तविक अर्थ कुछ और है जो सामान्य जनमानस को ठगने के कारण पाखण्डी ज्योतिषी ज्ञात नहीं कराते है।

समय और सर्प हमारे लिए पूज्य

काल का वास्तविक अर्थ है समय और सर्प हमारे लिए पूज्य है। महाकाल के अधिष्ठाता महाकालेश्वर भगवान शंकर अपने गले में सर्पदेव को प्रतिपल धारण किये रहते है। राहु के स्वामी तो साक्षात महादेव है, जो काल को नियन्त्रित करते है। शिवमहापुराण के अनुसार तो राहु का नक्षत्र आर्दा तो शिवजी का अतिप्रिय नक्षत्र है, जिस नक्षत्र में सूर्य के आने से वर्षा ऋतु प्रारम्भ होती है। जिस कारण काल अर्थात समय और सर्प हमारे लिए पूज्य है।

 मैंने आपके समक्ष मेरे विचार प्रस्तुत किये है। आशा है पाठक इस योग पर और भी विचार और शोध करेंगे और मुझे भी अपने विचारों से अवगत करायेंगे।

This Post Has 5 Comments

  1. Ganeah m. Dahat

    Kalsarpa yog

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